श्रीनगर। कश्मीर घाटी में अखरोट की कटाई का मौजूदा सीजन कई परिवारों के लिए दुखद साबित हुआ है। अलग-अलग घटनाओं में ऊंचे अखरोट के पेड़ों से गिरने के कारण अब तक सात लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई है। लगातार हो रही दुर्घटनाओं ने पारंपरिक अखरोट बागानों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
इन घटनाओं के बीच पुराने और विशाल अखरोट के पेड़ों की जगह आधुनिक हाई डेंसिटी बागान विकसित करने की मांग भी जोर पकड़ रही है। बागवानों का मानना है कि इससे उत्पादन बढ़ाने के साथ पेड़ों की ऊंचाई कम होने के कारण कटाई के दौरान जोखिम भी घटाया जा सकता है।
ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर लकड़ी के डंडों से तोड़े जाते हैं अखरोट
कश्मीर में अखरोट की कटाई लंबे समय से पारंपरिक तरीके से होती रही है। मजदूर और बागवान पेड़ों की ऊंची शाखाओं तक पहुंचने के लिए सीधे तने और डालियों पर चढ़ते हैं। इसके बाद लंबे लकड़ी के डंडों की मदद से अखरोट नीचे गिराए जाते हैं।
पुराने अखरोट के पेड़ काफी ऊंचे और विशाल होते हैं। कई पेड़ों की शाखाएं समय के साथ कमजोर या सूखी हो जाती हैं। बारिश के बाद शाखाओं पर फिसलन होने से जोखिम और बढ़ जाता है। ऐसे में पैर फिसलने, शाखा टूटने या संतुलन बिगड़ने पर मजदूर कई फीट की ऊंचाई से नीचे गिर सकते हैं।
मौजूदा कटाई सीजन में सात मौतों की घटनाओं ने इस खतरे को फिर सामने ला दिया है। कुलगाम में भी अखरोट तोड़ते समय पेड़ से गिरने के कारण एक व्यक्ति की मौत होने की घटना सामने आई है।
सुरक्षा उपकरणों के बिना पेड़ों पर चढ़ते हैं मजदूर
अखरोट की कटाई करने वाले अधिकांश मजदूरों के पास ऊंचाई पर काम करने के लिए जरूरी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं होते। सुरक्षा बेल्ट, हेलमेट, मजबूत रस्सी और सुरक्षित सीढ़ियों जैसी सुविधाओं के अभाव में काम करना जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
पेड़ से गिरने पर सिर, रीढ़ और शरीर के दूसरे हिस्सों में गंभीर चोट लग सकती है। दूरदराज के बागानों में दुर्घटना होने पर घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण होता है। कई बागान ऐसे इलाकों में हैं जहां तत्काल वाहन या एंबुलेंस पहुंचना आसान नहीं है।
पुराने पेड़ों की ऊंचाई और कम होती उत्पादकता से बढ़ी परेशानी
बागवानों के सामने केवल सुरक्षा का संकट नहीं है। पुराने अखरोट के पेड़ों की उत्पादकता और रखरखाव को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। विशाल पेड़ अधिक जगह घेरते हैं और उनकी छंटाई, दवा का छिड़काव तथा फल तोड़ने में ज्यादा श्रम की जरूरत पड़ती है।
बागवानों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में पुराने बागानों को उसी स्वरूप में बनाए रखना आर्थिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
हाई डेंसिटी बागानों से कम जगह में ज्यादा उत्पादन की उम्मीद
ड्राई फ्रूट एसोसिएशन ऑफ कश्मीर के अध्यक्ष हाजी बहादुर खान ने पुराने अखरोट बागानों को चरणबद्ध तरीके से हाई डेंसिटी प्लांटेशन में बदलने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि घाटी में बड़ी संख्या में अखरोट के पेड़ पुराने हो चुके हैं और उनकी उत्पादकता नई उन्नत किस्मों की तुलना में कम है।
हाई डेंसिटी व्यवस्था में अपेक्षाकृत छोटे आकार वाले उन्नत पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है। इससे एक सीमित क्षेत्र में अधिक पौधे लगाने की संभावना रहती है। पेड़ों की ऊंचाई कम होने के कारण छंटाई, दवा का छिड़काव और अखरोट की कटाई भी अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कम ऊंचाई वाले पेड़ों पर काम करने के कारण मजदूरों के गिरने का खतरा भी कम हो सकता है।
नई किस्मों में जल्दी उत्पादन की उम्मीद, लेकिन परिणाम कई परिस्थितियों पर निर्भर
पारंपरिक अखरोट के पेड़ों को फल देने में कई वर्ष लग सकते हैं और कुछ मामलों में उत्पादन शुरू होने में दस वर्ष से अधिक समय भी लग सकता है। इसके मुकाबले हाई डेंसिटी किस्मों में लगभग चार से पांच वर्ष में उत्पादन शुरू होने का दावा किया जाता है।
हालांकि वास्तविक उत्पादन पौधे की किस्म, मिट्टी की गुणवत्ता, जलवायु, सिंचाई व्यवस्था और बागान प्रबंधन जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा। इसलिए केवल पौधों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन और बेहतर बागान प्रबंधन की सुविधा भी देनी होगी।
अखरोट के पेड़ काटने पर कानून, पुराने पेड़ों को बदलना बागवानों के लिए चुनौती
बागानों के आधुनिकीकरण में कानूनी प्रावधान भी बड़ी चुनौती बन रहे हैं। कश्मीर में अखरोट के पेड़ जम्मू-कश्मीर प्रिजर्वेशन ऑफ स्पेसिफाइड ट्रीज एक्ट 1969 के तहत संरक्षित हैं। इनके कटान के लिए सरकारी अनुमति जरूरी होती है।
पेड़ों के संरक्षण का उद्देश्य क्षेत्र की महत्वपूर्ण प्राकृतिक और आर्थिक संपदा को सुरक्षित रखना है। हालांकि बागवानों का तर्क है कि बहुत पुराने, कम उत्पादक या असुरक्षित पेड़ों को हटाकर उनकी जगह नई उन्नत किस्म लगाने की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए।
उनकी मांग है कि विशेषज्ञों की जांच के आधार पर ऐसे पेड़ों की पहचान की जाए और वास्तविक रूप से अनुपयोगी या खतरनाक पेड़ों को हटाने के लिए सरल और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए।
स्थानीय अखरोट कारोबार पर सस्ते आयात का भी दबाव
कश्मीर का अखरोट उद्योग उत्पादन और सुरक्षा के साथ आर्थिक दबाव का भी सामना कर रहा है। कारोबारियों के अनुसार, स्थानीय उत्पादकों को जीएसटी और चिली तथा कैलिफोर्निया जैसे क्षेत्रों से आने वाले अपेक्षाकृत सस्ते अखरोट से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है।
पुराने पेड़ों से कम उत्पादन और कटाई में अधिक श्रम लागत के कारण स्थानीय किसानों की आमदनी प्रभावित हो रही है। ऐसे में हाई डेंसिटी बागान किसानों को सीमित जमीन में अधिक उत्पादन का विकल्प दे सकते हैं। हालांकि इसके लिए प्रमाणित पौधे, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बेहतर बाजार व्यवस्था जरूरी होगी।
नई व्यवस्था आने में समय लगेगा, तब तक मजदूरों की सुरक्षा सबसे जरूरी
हाई डेंसिटी बागानों में बदलाव तत्काल नहीं हो सकता। नए पौधों को तैयार होने और उत्पादन देने में कई वर्ष लगेंगे। इसलिए मौजूदा अखरोट कटाई व्यवस्था में काम कर रहे मजदूरों की सुरक्षा के लिए तत्काल उपाय करना जरूरी है।
सुरक्षा बेल्ट, मजबूत रस्सियां, हेलमेट और सुरक्षित सीढ़ियों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। बारिश के बाद गीले पेड़ों पर चढ़ने से बचने और कमजोर शाखाओं की पहले पहचान करने को लेकर भी बागवानों और मजदूरों के बीच जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
अखरोट कटाई के दौरान हुई सात मौतों ने साफ कर दिया है कि कश्मीर के अखरोट उद्योग के सामने चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाने की नहीं है। इसमें मजदूरों की सुरक्षा, किसानों की आय, पुराने बागानों का नवीनीकरण और प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के बीच संतुलन बनाना भी उतना ही जरूरी है।

