दिल्ली: ग्रेट निकोबार आइलैंड मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी है। केंद्र ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें परियोजना के लिए मंजूरी लेने में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के कथित उल्लंघन से जुड़ी जनहित याचिकाओं को सुनवाई योग्य माना गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इन PIL पर हाईकोर्ट में सुनवाई आगे जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को तय तारीख पर सुनवाई के दिए निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र की याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने कहा कि मामला पहले से ही हाईकोर्ट के समक्ष लंबित है और वहां 25 व 26 नवंबर को सुनवाई निर्धारित है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से कहा कि तय तारीख पर इस मामले से जुड़ी सभी लंबित याचिकाओं को साथ लेकर सुनवाई की जाए।
केंद्र ने PIL की सुनवाई योग्यता पर उठाए सवाल
केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने जनहित याचिकाओं की सुनवाई योग्यता पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि यह परियोजना राष्ट्रीय महत्व से जुड़ी है और इसके पर्यावरणीय पहलुओं को पहले ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में चुनौती दी जा चुकी है।
केंद्र की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि एक ही परियोजना को अलग-अलग आधारों पर चुनौती देने से कई समानांतर कानूनी कार्यवाहियां शुरू हो सकती हैं।
आदिवासी समूहों ने बताया, मामला PVTG समुदायों के अधिकारों से जुड़ा
एक आदिवासी परिषद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने कहा कि मामला विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों यानी PVTG से जुड़ा है। इसी आधार पर उन्होंने जनहित याचिकाओं को सुनवाई योग्य बनाए रखने का पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने भी मामले में उठने वाले व्यापक संवैधानिक सवालों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान मूल निवासी समुदायों की पहचान और उनकी संस्कृति को संवैधानिक संरक्षण देने से जुड़े पहलुओं पर भी विचार किया जा सकता है।
आदिवासी पहचान और संस्कृति के संरक्षण पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में समय के साथ हुए जनसांख्यिकीय बदलावों का भी उल्लेख हुआ। जस्टिस बागची ने ग्रेट अंडमानी समुदाय के संदर्भ में सवाल उठाया कि क्या मुख्यधारा की आबादी के साथ घुलने-मिलने के बावजूद उनकी विशिष्ट पहचान और संस्कृति को अलग रूप में संरक्षित रखा जाना चाहिए।
कोर्ट की टिप्पणी में संस्कृति के संरक्षण को संवैधानिक अधिकार से जोड़कर देखा गया। इससे साफ है कि मामले की सुनवाई केवल परियोजना की मंजूरी तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि आदिवासी समुदायों की पहचान और अधिकारों से जुड़े व्यापक पहलुओं पर भी चर्चा हो सकती है।
हाईकोर्ट में किन मुद्दों पर होनी है सुनवाई
कलकत्ता हाईकोर्ट ने 6 मई को ग्रेट निकोबार परियोजना से संबंधित PIL को सुनवाई के योग्य माना था। इन याचिकाओं में परियोजना के लिए विभिन्न मंजूरियां हासिल करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं ने वन अधिकार अधिनियम, 2006 के कथित उल्लंघन के अलावा राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास इको सेंसिटिव बफर जोन को कम किए जाने जैसे मुद्दे भी उठाए हैं।
25 और 26 नवंबर को फिर होगी सुनवाई
अब इस मामले में अगली महत्वपूर्ण सुनवाई कलकत्ता हाईकोर्ट में 25 और 26 नवंबर को प्रस्तावित है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अपने स्तर पर आगे बढ़ाने के बजाय हाईकोर्ट को लंबित याचिकाओं पर निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुनवाई करने को कहा है।
ऐसे में ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर अब हाईकोर्ट की सुनवाई पर नजर रहेगी, जहां पर्यावरणीय मंजूरियों के साथ वन अधिकार और आदिवासी समुदायों से जुड़े मुद्दों पर भी आगे की कानूनी बहस होगी।

