दिल्ली : ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने जामरूदपुर इलाके में लोदी काल के मकबरों की स्थिति और कथित अतिक्रमण से जुड़ी रिपोर्टों पर गंभीर नाराजगी जताई है।
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर की तारीख तय करते हुए MCD के एडिशनल कमिश्नर और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
रिपोर्ट में सामने आई अलग तस्वीर
यह मामला दिल्ली निवासी राजीव सूरी की ओर से दायर उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें राजधानी की ऐतिहासिक और विरासत संरचनाओं के संरक्षण तथा रखरखाव की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि जामरूदपुर में लोदी काल से संबंधित पांच मकबरों का सर्वे किया गया था। MCD की 10 अप्रैल को दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से एक संरचना संतोषजनक स्थिति में थी, जबकि तीन अन्य के आसपास अतिक्रमण और कचरा पाए जाने की बात सामने आई।
एक विरासत संरचना का रिकॉर्ड ही नहीं मिला
कोर्ट द्वारा नियुक्त कमिश्नर सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन तथा एडवोकेट निपुण सक्सेना और विशाल सिन्हा ने अदालत को बताया कि जामरूदपुर में MCD के अधिकार क्षेत्र में पांच ग्रेड-1 विरासत संरचनाएं दर्ज थीं। इनमें से एक संरचना का मौके पर पता ही नहीं चल सका।
इस जानकारी के सामने आने के बाद अदालत ने MCD की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की। बेंच ने माना कि उपलब्ध तथ्यों से प्रथम दृष्टया लापरवाही और महत्वपूर्ण जानकारी छिपाए जाने का सवाल उठता है, क्योंकि पहले ऐसी संरचनाओं को अतिक्रमण से मुक्त बताया गया था।
अब जवाबदेही तय करने की तैयारी
अदालत ने दोनों विभागों के शीर्ष अधिकारियों को हलफनामे के जरिए यह स्पष्ट करने को कहा है कि विरासत संरचनाओं की ऐसी स्थिति सामने आने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी। उस दिन अधिकारियों की व्यक्तिगत मौजूदगी और उनके जवाब से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि जामरूदपुर की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में हुई कथित लापरवाही के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।

