नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में विरोध प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण की ड्यूटी में तैनात दिल्ली पुलिस तथा रैपिड एक्शन फोर्स यानी RAF के जवानों के लिए बॉडी-वर्न कैमरे अनिवार्य करने की मांग की गई है। याचिका में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और संबंधित अधिकारियों को इस व्यवस्था के लिए स्पष्ट नियम और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी SOP तैयार करने का निर्देश देने की मांग रखी गई है।याचिका अधिवक्ता चाहत राघव ने दाखिल की है। इसमें कहा गया है कि प्रदर्शन या भीड़ नियंत्रण के दौरान सुरक्षाकर्मियों के कैमरे लगातार रिकॉर्डिंग मोड में रहने चाहिए, ताकि किसी घटना की स्थिति में घटनाक्रम का निष्पक्ष रिकॉर्ड उपलब्ध हो सके।
सिर्फ कैमरा नहीं, रिकॉर्ड का हिसाब भी
याचिका में बॉडी कैमरे उपलब्ध कराने के साथ रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने की पूरी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इसमें वीडियो कितने समय तक सुरक्षित रहेगा, फुटेज में छेड़छाड़ कैसे रोकी जाएगी और जरूरत पड़ने पर जांच या अदालत में रिकॉर्डिंग कैसे उपलब्ध कराई जाएगी, इसे लेकर स्पष्ट नियम बनाने की बात कही गई है।याचिकाकर्ता का कहना है कि कैमरा कब शुरू होगा और किन परिस्थितियों में उसे बंद किया जा सकेगा, इसकी जानकारी भी SOP में स्पष्ट होनी चाहिए।
जंतर-मंतर के प्रदर्शनों से जुड़ा मामला
यह PIL जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विभिन्न प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में दाखिल की गई है। याचिका में कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े प्रदर्शन और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से संबंधित घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है।याचिकाकर्ता के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई और कथित बल प्रयोग से जुड़ी कई तस्वीरें और वीडियो मौके पर मौजूद लोगों या प्रदर्शनकारियों के मोबाइल फोन से सामने आए थे।
पहले भी उठी थी फुटेज बचाने की मांग
सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाए जाने से जुड़े एक अन्य मामले में भी दिल्ली हाई कोर्ट के सामने बॉडी कैमरा और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने की मांग रखी गई थी। उस मामले में कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़े वीडियो और दूसरे साक्ष्यों को संरक्षित करने की मांग की गई थी।हालांकि हाई कोर्ट ने उस PIL को आगे सुनने से इनकार कर दिया था और याचिकाकर्ता को कानून में उपलब्ध अन्य उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी थी।
पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों के लिए जवाबदेही
नई याचिका में तर्क दिया गया है कि बॉडी कैमरों की अनिवार्य व्यवस्था से विवादित घटनाओं की जांच अधिक पारदर्शी तरीके से हो सकती है। रिकॉर्डिंग से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी घटना की शुरुआत कैसे हुई, बल प्रयोग की स्थिति क्यों बनी और उस दौरान पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों की भूमिका क्या रही।याचिकाकर्ता के मुताबिक ऐसी व्यवस्था पुलिसकर्मियों पर लगे आरोपों की जांच के साथ प्रदर्शनकारियों से जुड़ी शिकायतों की पड़ताल में भी उपयोगी हो सकती है।
मांग का आधार क्या है
याचिका में बॉडी कैमरों की व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और अनुच्छेद 21 से जोड़ा गया है। इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा के अधिकार और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण का हवाला दिया गया है।याचिकाकर्ता का दावा है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट रिकॉर्डिंग व्यवस्था नहीं होने से इन संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े हो सकते हैं।
दिल्ली में कुछ जवानों को मिल चुके हैं कैमरे
हाल के प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से बॉडी-वर्न कैमरों का इस्तेमाल भी किया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक नई दिल्ली इलाके में फ्रंटलाइन ड्यूटी पर तैनात कुछ पुलिसकर्मियों को ऐसे कैमरे उपलब्ध कराए गए हैं।हालांकि नई PIL में मांग केवल कुछ कर्मियों तक सीमित नहीं है। याचिका में प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण की ड्यूटी में शामिल दिल्ली पुलिस तथा RAF के संबंधित जवानों के लिए एक समान और अनिवार्य व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।
अब हाई कोर्ट के रुख पर नजर
याचिका में कैमरों के इस्तेमाल के साथ डेटा सुरक्षा और फुटेज की प्रमाणिकता से जुड़े प्रावधान बनाने की भी मांग की गई है। खास तौर पर यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है कि रिकॉर्डिंग को बदला या हटाया न जा सके और जरूरत पड़ने पर जांच एजेंसियों तथा अदालत को मूल फुटेज उपलब्ध कराया जा सके।अब दिल्ली हाई कोर्ट यह तय करेगा कि इस जनहित याचिका पर किस तरह आगे सुनवाई की जाए और संबंधित सरकारी एजेंसियों से जवाब मांगा जाए या नहीं। यदि अदालत इस संबंध में कोई दिशा-निर्देश जारी करती है, तो दिल्ली में प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है।

