विशाखापत्तनम। किंग जॉर्ज हॉस्पिटल में शुरू की गई सेंटर ऑफ कॉम्पिटेंस लैब ने आनुवंशिक हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी है। मई 2026 में शुरू हुई इस विशेष लैब में अब तक 121 ब्लड सैंपल की जांच की गई, जिनमें 94 सैंपल में किसी न किसी तरह का जेनेटिक हीमोग्लोबिन विकार या कैरियर स्टेटस सामने आया है। यानी जांच किए गए सैंपल में करीब 77.7 प्रतिशत में आनुवंशिक बदलाव पाए गए।
यह लैब आंध्र प्रदेश में अपनी तरह की पहली सुविधा है और विशाखापत्तनम के साथ विजयनगरम, श्रीकाकुलम तथा अल्लूरी सीताराम राजू जिलों के लिए क्षेत्रीय डायग्नोस्टिक सेंटर के रूप में काम कर रही है। यहां जांच से लेकर जेनेटिक काउंसलिंग और क्लिनिकल मैनेजमेंट तक की सुविधाएं निशुल्क उपलब्ध हैं।
सिकल सेल से लेकर थैलेसीमिया तक कई मामले सामने आए
जांच के दौरान 33 सैंपल में सिकल सेल ट्रेट पाया गया। 23 मरीजों में होमोजायगस सिकल सेल बीमारी की पुष्टि हुई। इसके अलावा 10 सैंपल में थैलेसीमिया और छह में थैलेसीमिया मेजर सामने आया।
छह सैंपल में सिकल सेल और थैलेसीमिया का मिश्रित रूप मिला। वहीं दो सैंपल में HbD, HbC और HbE जैसे दुर्लभ हीमोग्लोबिन वैरिएंट की पहचान हुई।
आधुनिक तकनीक से हो रही जांच
KGH की सेंटर ऑफ कॉम्पिटेंस लैब में हाई परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी, कैपिलरी इलेक्ट्रोफोरेसिस और वैरिएंट न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
अब तक 70 सैंपल की जांच HPLC के जरिए, 49 की कैपिलरी इलेक्ट्रोफोरेसिस से और दो सैंपल की वैरिएंट न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग के माध्यम से की गई है।
आदिवासी इलाकों से भी पहुंच रहे सैंपल
लैब तक सैंपल KGH के अलावा सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों, जिला और क्षेत्रीय अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा विशेष आदिवासी स्वास्थ्य केंद्रों से भेजे जा रहे हैं।
नेशनल सिकल सेल एनीमिया एलिमिनेशन प्रोग्राम के तहत फील्ड स्तर पर एकत्र किए गए सैंपल भी यहां जांच के लिए पहुंच रहे हैं। दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों से आने वाले नमूनों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विशेष कोल्ड चेन व्यवस्था अपनाई जा रही है।
सैंपल EDTA ट्यूब में सुरक्षित कर 2 से 8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर कोल्ड बॉक्स के जरिए लैब तक लाए जाते हैं। जांच से पहले मरीज की जानकारी, सैंपल की मात्रा, तापमान का रिकॉर्ड और नमूने की गुणवत्ता की जांच की जाती है।
जांच के साथ इलाज और लंबे समय की निगरानी
सेंटर में केवल बीमारी की पहचान तक सीमित व्यवस्था नहीं है, बल्कि अलग-अलग विभागों के माध्यम से मरीजों को उपचार और फॉलोअप भी दिया जा रहा है।
पीडियाट्रिक्स विभाग सिकल सेल बीमारी और थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित बच्चों की देखभाल कर रहा है। इसमें ब्लड ट्रांसफ्यूजन, हाइड्रॉक्सीयूरिया और फोलिक एसिड थेरेपी के साथ टीकाकरण की निगरानी शामिल है। जून में छह सक्रिय मामलों का उपचार किया गया, जबकि जुलाई और अगस्त के दौरान तीन अन्य मामलों को देखा गया।
जनरल मेडिसिन विभाग वयस्क मरीजों की निगरानी कर रहा है। वहीं ऑब्सटेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी विभाग हाई रिस्क प्रेगनेंसी की स्क्रीनिंग, कैरियर दंपतियों की जेनेटिक काउंसलिंग और आनुवंशिक एनीमिया से प्रभावित गर्भावस्थाओं के प्रबंधन में भूमिका निभा रहा है।
2.85 करोड़ रुपये से तैयार हुआ सेंटर
सेंटर के लिए करीब 2.85 करोड़ रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है। इसके संचालन में सालाना मेंटेनेंस के लिए 16.93 लाख रुपये और रिएजेंट तथा टेस्टिंग किट के लिए 45.54 लाख रुपये का बजट निर्धारित किया गया है।
KGH की सुपरिटेंडेंट ई. वाणी के अनुसार सेंटर में सभी डायग्नोस्टिक जांच, जेनेटिक काउंसलिंग और क्लिनिकल मैनेजमेंट की सेवाएं मरीजों को पूरी तरह निशुल्क दी जा रही हैं।
शुरुआती पहचान से आने वाली पीढ़ियों को भी फायदा
स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार यादव ने कहा कि सरकार आदिवासी क्षेत्रों में उन्नत स्क्रीनिंग और उपचार की सुविधाओं का विस्तार करने पर विशेष ध्यान दे रही है। उनका कहना है कि आनुवंशिक बीमारियों की समय पर पहचान और जेनेटिक काउंसलिंग से मरीजों को जल्द उपचार उपलब्ध कराने के साथ भविष्य की पीढ़ियों में इन बीमारियों के प्रभाव को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

