नई दिल्ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने देश की शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और सरकारी नीतियों को लेकर चिंता जताई है। एक साक्षात्कार में उन्होंने पेपर लीक, भ्रष्टाचार, शिक्षा के निजीकरण और सरकारी स्कूलों की स्थिति जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी। उनके मुताबिक, युवाओं से ईमानदारी और मेहनत की उम्मीद करने से पहले व्यवस्था को भी पारदर्शी और जवाबदेह बनाना जरूरी है।
डिग्री बढ़ी, लेकिन रोजगार का रास्ता क्यों नहीं खुला
मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में केवल नए कॉलेज और संस्थान खोलना पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य सिर्फ डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि युवाओं को रोजगार और भविष्य की चुनौतियों के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए।
पेपर लीक को सिर्फ परीक्षा की खामी मानना ठीक नहीं
पेपर लीक की घटनाओं को लेकर जोशी ने इसे व्यापक भ्रष्टाचार से जोड़कर देखा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि समाज और प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्ट आचरण के उदाहरण लगातार सामने आते हैं, तो केवल छात्रों को जिम्मेदार ठहराना उचित कैसे हो सकता है।
उनके अनुसार, परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के साथ उन परिस्थितियों पर भी रोक लगानी होगी, जो युवाओं को गलत रास्ते अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं।
शिक्षा को कारोबार बनाने से बढ़ सकती है असमानता
शिक्षा के निजीकरण पर भी पूर्व केंद्रीय मंत्री ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाएं समाज की मूल जरूरतों से जुड़ी हैं और इन्हें केवल आर्थिक लाभ के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
उनका तर्क है कि यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लगातार महंगी होती गई तो आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों के लिए अच्छे संस्थानों तक पहुंच कठिन हो सकती है। इससे सामाजिक असमानता और गहरी होने का खतरा रहेगा।
सरकारी स्कूलों में सिर्फ इमारतें काफी नहीं
जोशी ने सरकारी स्कूलों की स्थिति पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, कई स्थानों पर स्कूल भवन तो उपलब्ध हैं, लेकिन पर्याप्त शिक्षक, आधुनिक संसाधन और बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था की कमी बनी हुई है।
उन्होंने सरकारी स्कूलों में कम होती छात्र संख्या पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पहले यह समझना जरूरी है कि अभिभावक और विद्यार्थी इन संस्थानों से दूरी क्यों बना रहे हैं।
विकास का पैमाना सिर्फ सड़क और इमारत नहीं
शिक्षा बजट और सरकार की प्राथमिकताओं का जिक्र करते हुए जोशी ने कहा कि किसी देश की वास्तविक प्रगति उसके नागरिकों की क्षमता से तय होती है। उनके अनुसार, विकास की चर्चा में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक संतुलन को भी उतनी ही अहमियत मिलनी चाहिए।
उन्होंने विकसित भारत के लक्ष्य को व्यापक नजरिए से देखने की बात कही और कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ नागरिकों के जीवन स्तर और अवसरों में सुधार भी विकास का हिस्सा होना चाहिए।
बयान के बाद राजनीतिक चर्चा तेज
मुरली मनोहर जोशी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और लंबे समय तक केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। ऐसे में शिक्षा और शासन से जुड़े उनके सवालों ने राजनीतिक चर्चा को तेज कर दिया है।
उनकी टिप्पणियों को विपक्ष सरकार की नीतियों पर सवाल के तौर पर देख रहा है, जबकि इसे व्यवस्था में सुधार की जरूरत को लेकर एक वरिष्ठ नेता की चिंता के रूप में भी देखा जा रहा है। कुल मिलाकर, उनके बयान ने शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और युवाओं के भविष्य से जुड़े पुराने सवालों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

