- असम में जन्मे भूपेन हजारिका ने बनारस और अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की।
- उनके गीतों ने गरीबी, शोषण और असमानता के बीच इंसानियत, भाईचारे और एकता का संदेश दिया।
- असमिया लोक धुनों को वैश्विक पहचान दिलाई; ‘रुदाली’ के संगीत ने हिंदी सिनेमा में अमिट छाप छोड़ी।
ब्रह्मपुत्र के असीम वेग और असम की माटी की महक को सुर देने वाले ‘भारत रत्न’ डॉ. भूपेन हजारिका सिर्फ एक गायक नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की आत्मा और सच्चे जननायक थे। उन्होंने संगीत को कभी मात्र मनोरंजन नहीं माना, बल्कि उसे समाज के आखिरी इंसान की आवाज़ और बदलाव का साधन बनाया। उनके गीतों में प्यार, दर्द, संघर्ष और इंसानियत की गहरी सच्चाई झलकती थी। बनारस से पढ़ाई के बाद कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी के दौरान महान अफ्रीकी-अमेरिकी गायक पॉल रॉबसन के संपर्क ने उनकी कला को वैश्विक दृष्टि दी। वे एक प्रखर गायक के साथ-साथ कवि, लेखक, विचारक और फिल्मकार भी थे। ‘एरुवाता’, ‘शकुंतला’ और ‘रुदाली’ जैसी फिल्मों में उनके संगीत ने अमिट छाप छोड़ी। असम की लोक-संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने वाले भूपेन दा ने भाषा और सरहदों की दीवारें तोड़कर हमेशा इंसानी भाईचारे और एकता का संदेश दिया।
असम की मिट्टी में पली संगीत की प्रतिभा

भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया जिले के सदिया में हुआ था। उनके पिता नीलकांत हजारिका और माता शांतिप्रिया हजारिका थीं। घर में शिक्षा, साहित्य और संगीत का अच्छा वातावरण था। उनकी मां को लोकगीतों से विशेष लगाव था। बचपन में मां से सुने गीतों और असम की लोक परंपराओं ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। यही संस्कार आगे चलकर उनकी संगीत साधना का आधार बने। महज दस वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला गीत लिखा और गाया। उनकी प्रतिभा को असम के प्रसिद्ध कवि एवं संगीतकार ज्योति प्रसाद अग्रवाल और कलागुरु विष्णु प्रसाद राभा ने पहचाना तथा उन्हें प्रोत्साहित किया। वर्ष 1939 में केवल 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने असमिया फिल्म ‘इंद्रमालती’ के लिए गीत गाए। इतनी कम उम्र में फिल्म जगत से उनका जुड़ना उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण था।
शिक्षा और पॉल रॉबसन से मुलाकात ने दी नई सोच

भूपेन हजारिका ने असम में शुरुआती पढ़ाई के बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से 1944 में स्नातक और 1946 में राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर की डिग्री ली। इसके बाद अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय से जनसंचार में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। अमेरिका प्रवास के दौरान महान अफ्रीकी-अमेरिकी गायक व मानवाधिकार कार्यकर्ता पॉल रॉबसन से उनकी मुलाकात हुई। रॉबसन के गीत ‘ओल्ड मैन रिवर’ और उनके सामाजिक विचारों ने भूपेन दा को गहराई से प्रभावित किया। इस अनुभव ने उन्हें सिखाया कि संगीत केवल सुर-ताल नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का सशक्त माध्यम है। विदेश में उच्च शिक्षा और ग्लोबल विज़न मिलने के बावजूद उनका अपनी माटी से जुड़ाव हमेशा बना रहा। वे असम लौटे और अपनी कला को पूरी तरह जन-सरोकारों और समाज सेवा से जोड़ दिया।
लोकधुनों को आधुनिक संगीत से जोड़कर बनाई अलग पहचान

भूपेन हजारिका की सबसे बड़ी विशेषता असम की लोक संस्कृति को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ने की उनकी क्षमता थी। उनके गीतों में बिहू, बोरगीत और जनजातीय संगीत की धुनें सुनाई देती हैं। उन्होंने पारंपरिक वाद्य यंत्रों और आधुनिक संगीत का ऐसा मेल तैयार किया, जिससे असमिया संगीत को नई पहचान मिली। उनकी आवाज में गहराई और गंभीरता थी। इसी कारण उन्हें ‘सुधाकंठ’ के नाम से जाना गया। उन्हें ‘ब्रह्मपुत्र का कवि’ भी कहा जाता है। उनके गीतों में असम की नदियां, पहाड़, चाय बागान, जंगल, खेत और वहां के आम लोगों का जीवन जीवंत हो उठता है। उन्होंने असमिया भाषा में रचनाएं करने के साथ बंगाली और हिंदी सहित कई भाषाओं में भी गीत गाए। इस तरह उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक विरासत को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गीतों में सामाजिक पीड़ा और इंसानियत का संदेश
भूपेन हजारिका के गीतों की सबसे बड़ी ताकत उनकी गहरी सामाजिक चेतना थी। वे गरीबी, शोषण, असमानता और आम लोगों की पीड़ा को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाते थे। उनका प्रसिद्ध असमिया गीत ‘मानुहे मानुहर बाबे’ (मनुष्य मनुष्य के लिए) मानवता और आपसी सहयोग का संदेश देता है, जो सिखाता है कि इंसानियत का अर्थ दूसरों के दुख-दर्द में साथ देना है। इसी तरह ‘बिस्तीर्ण दोपारे’ (हिंदी में ‘गंगा बहती हो क्यों?’) के ज़रिए उन्होंने नदी के बहाने समाज की विसंगतियों और संवेदनहीनता पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और विश्व शांति का संदेश देते हुए तनाव के दौर में भी लोगों को जोड़ने का कार्य किया। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि कला की कोई सीमा नहीं होती; उसका एकमात्र उद्देश्य दिलों की दूरियां मिटाकर मानवीय संवेदनाओं को जगाना है।
सिनेमा में भी छोड़ी अपनी अमिट छाप

भूपेन हजारिका ने असमिया सिनेमा को समृद्ध करने में गीतकार, गायक, संगीतकार और निर्देशक के रूप में अहम भूमिका निभाई। वर्ष 1956 की फिल्म ‘एरा बातोर सूर’ से उन्हें फिल्मकार के रूप में पहचान मिली, जिसके बाद ‘शकुंतला’, ‘प्रतिध्वनि’ और ‘लोटी घोटी’ जैसी फिल्मों से उन्होंने मानवीय संबंधों और सांस्कृतिक मूल्यों को उभारा। हिंदी सिनेमा में भी कल्पना लाजमी के साथ उनकी रचनात्मक साझेदारी बेहद खास रही। ‘एक पल’, ‘दमन’, ‘साज़’ और विशेषकर ‘रुदाली’ के गीत ‘दिल हूं हूं करे’ (जो आज भी बेहद लोकप्रिय है) में उनके संगीत ने कहानी और पात्रों की भावनाओं को गहराई दी। इसके अलावा, उन्होंने बच्चों के लिए गीत रचकर असम की लोक धुनों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी सक्रिय रहे
भूपेन हजारिका केवल मंच और स्टूडियो तक सीमित कलाकार नहीं थे। वह सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी सक्रिय रहे। वर्ष 1967 से 1972 तक वह असम विधानसभा के निर्दलीय सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र के विकास और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाया। उन्होंने अपनी लोकप्रियता का उपयोग सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक एकता के लिए किया। वह संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रहे और प्रसार भारती बोर्ड से भी जुड़े। इन भूमिकाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय कला, संगीत और सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास में योगदान दिया। उनका मानना था कि किसी समाज की पहचान उसकी भाषा, लोक कला और सांस्कृतिक परंपराओं से बनती है। इसलिए उन्होंने असम की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम किया।
सम्मान और उपलब्धियों से सजा जीवन

भूपेन हजारिका की संगीत साधना और सांस्कृतिक योगदान को अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। वर्ष 1975 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। वर्ष 1977 में पद्मश्री और 1987 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारतीय सिनेमा में आजीवन योगदान के लिए वर्ष 1992 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2001 में पद्म भूषण और 2008 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से नवाजा गया। उन्हें असम रत्न सहित कई अन्य सम्मान भी मिले। उनके निधन के बाद वर्ष 2012 में पद्म विभूषण और वर्ष 2019 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
गीतों में हमेशा जीवित रहेंगे भूपेन हजारिका
5 नवंबर 2011 को मुंबई में भूपेन हजारिका का निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय संगीत जगत ने एक ऐसी आवाज खो दी, जिसने असम की मिट्टी की खुशबू को पूरी दुनिया तक पहुंचाया था। उनके अंतिम संस्कार में गुवाहाटी में उमड़ी लाखों लोगों की भीड़ उनके प्रति लोगों के प्रेम और सम्मान का प्रमाण थी। भूपेन हजारिका का जीवन बताता है कि सच्ची कला वही है, जो लोगों के दिलों को छुए और समाज को बेहतर बनाने में योगदान दे। उन्होंने अपने गीतों से भाषा, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं को पार करते हुए मानवता का संदेश दिया। आज भी उनके गीत सुनने वालों को प्रेम, समानता, भाईचारे और सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाते हैं। वह केवल एक महान गायक या संगीतकार नहीं थे, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक चेतना थे, जिसकी गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी।

