मध्य प्रदेश : विंध्य क्षेत्र अपनी समृद्ध खान-पान परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां के रीवा जिले की एक खास पहचान इदरहर की कढ़ी भी है। यह पारंपरिक व्यंजन अपने अनोखे स्वाद, देसी मसालों और बनाने के खास तरीके के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय है। विंध्य में इसे इंद्रहार के नाम से भी जाना जाता है। खास बात यह है कि इसे चार तरह की दालों को मिलाकर तैयार किया जाता है। क्षेत्र में छोटे-बड़े मांगलिक कार्यक्रमों और खास आयोजनों के दौरान इस पकवान को परोसने की परंपरा रही है।
चार दालों के मेल से तैयार होता है यह खास व्यंजन
इदरहर की कढ़ी बनाने के लिए मूंग, चना, उड़द और मसूर की दाल का इस्तेमाल किया जाता है। इन चारों दालों को मिलाकर पीसा जाता है। इसके बाद मिश्रण में धनिया, जीरा, काली मिर्च, मिर्च, शहजीरा, तेजपत्ता, जायफल और अन्य स्थानीय मसाले मिलाए जाते हैं। इससे तैयार पेस्ट में मसालों की खुशबू और दालों का स्वाद एक साथ मिलता है।
पहले भाप में पकाया जाता है दालों का मिश्रण
इदरहर तैयार करने की प्रक्रिया भी इसे दूसरे पकवानों से अलग बनाती है। मसालों और दालों से बने पेस्ट को एक थाली में फैलाकर भाप में पकाया जाता है। स्थानीय बोली में इस प्रक्रिया से तैयार मिश्रण को उसीना कहा जाता है। पकाने के बाद इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है।
तलने के बाद बनते हैं बोरउर या बोररा
भाप में पकाए गए मिश्रण के टुकड़ों को तेल में तलने पर उन्हें बोरउर या बोररा कहा जाता है। इस तरह तैयार टुकड़े आगे इदरहर की कढ़ी बनाने में इस्तेमाल किए जाते हैं। चारों दालों और मसालों का मेल इस व्यंजन को अलग स्वाद और खास बनावट देता है।
विंध्य के समारोहों में खास स्थान रखता है इदरहर
इदरहर की कढ़ी केवल रोजमर्रा के भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि विंध्य की स्थानीय खाद्य संस्कृति का अहम हिस्सा भी है। रीवा और आसपास के क्षेत्रों में विभिन्न सामाजिक, पारिवारिक और मांगलिक आयोजनों में इसे विशेष रूप से बनाया जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही इसकी रेसिपी क्षेत्र की पारंपरिक पाक कला को दर्शाती है।
यही वजह है कि इदरहर की कढ़ी को विंध्य के खास पारंपरिक व्यंजनों में गिना जाता है। चार दालों, सुगंधित मसालों और पारंपरिक विधि से तैयार होने वाला यह पकवान स्थानीय खान-पान की विशिष्ट पहचान बना हुआ है।

