उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को प्रशासन द्वारा हटाए जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस कार्रवाई पर भाजपा सरकार को निशाने पर लेते हुए धार्मिक सौहार्द और सभी धर्मों के सम्मान की बात कही है। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि सरकारी भूमि से कथित अनधिकृत कब्जा हटाने के लिए अदालत के आदेश के अनुपालन में की गई।
अखिलेश यादव ने धार्मिक सौहार्द का मुद्दा उठाया
सहारनपुर की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने सनातन परंपरा में बताए गए ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दूसरे धर्मों और उनकी आस्था का सम्मान करना जरूरी है। उनके मुताबिक जो लोग दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान नहीं रखते, उन्हें सच्चा सनातनी नहीं कहा जा सकता।सपा प्रमुख ने सरकार की जिम्मेदारी को भी धार्मिक सौहार्द से जोड़ा और आरोप लगाया कि इस तरह की कार्रवाई से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। ये अखिलेश यादव के राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
सुबह करीब पांच बजे हुई कार्रवाई
रिपोर्ट के अनुसार शनिवार तड़के करीब पांच बजे सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद के ढांचे को प्रशासन ने पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच हटाया। बुलडोजर और अन्य मशीनों की मदद से कार्रवाई की गई।प्रशासन ने कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए परिसर और आसपास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की थी। कार्रवाई के दौरान इलाके में गतिविधियों पर निगरानी रखी गई।
जमीन के मालिकाना हक को लेकर था विवाद
मस्जिद को लेकर प्रशासन और संबंधित पक्ष के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने उत्तर प्रदेश लोक परिसर अधिनियम के तहत आदेश जारी किया था। 36 पन्नों के इस आदेश में संबंधित पक्ष को 30 दिनों के भीतर परिसर खाली करने को कहा गया था।प्रशासन का दावा था कि मस्जिद सरकारी भूमि पर स्थित है और वहां कब्जा अधिकृत नहीं है। इसके बाद मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी।
जिला अदालत से भी नहीं मिली राहत
जिला जज की अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर दी। अदालत के आदेश में संबंधित भूमि को सरकारी जमीन माना गया। इसके बाद प्रशासन के लिए पहले जारी बेदखली आदेश को लागू करने का रास्ता साफ हो गया।जुलाई में जारी आदेश से जुड़े मामले में कथित अनधिकृत उपयोग को लेकर 6.41 करोड़ रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति का उल्लेख भी सामने आया था। मस्जिद पक्ष की ओर से उच्च न्यायालय जाने की तैयारी की बात कही गई थी।
कार्रवाई के समय को लेकर विपक्ष के सवाल
विपक्षी नेताओं ने खास तौर पर कार्रवाई के समय पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि संबंधित पक्ष के पास उच्च न्यायालय या आगे की अदालत में जाने का विकल्प मौजूद था तो सुबह के समय इतनी जल्द कार्रवाई करने की जरूरत क्या थी।अखिलेश यादव ने भी सवाल उठाया कि क्या मस्जिद पक्ष को उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट जाने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए था। हालांकि प्रशासन का कहना है कि जिला अदालत द्वारा पहले के आदेश को बरकरार रखे जाने के बाद बेदखली संबंधी आदेश प्रभावी था और उसी के अनुपालन में कार्रवाई की गई।
इकरा हसन ने लगाया हाउस अरेस्ट का आरोप
कार्रवाई के बाद राजनीतिक तनाव और बढ़ गया। कैराना से सपा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकते हुए उनके आवास के बाहर पुलिस बल तैनात किया गया और उन्हें हाउस अरेस्ट किया गया।वह मस्जिद ध्वस्तीकरण का विरोध करने के लिए सहारनपुर जाना चाहती थीं। इस मामले को लेकर सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी प्रशासन और सरकार पर सवाल उठाए।
ओवैसी ने भी कार्रवाई के वक्त पर जताई आपत्ति
असदुद्दीन ओवैसी ने भी तड़के हुई कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित पक्ष को ऊपरी अदालत का रुख करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए था। इस तरह विपक्ष की ओर से मुख्य सवाल कार्रवाई की वैधता के साथ-साथ उसके समय और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।दूसरी ओर प्रशासन अपने कदम को अदालत के फैसले और सरकारी भूमि से कब्जा हटाने की प्रक्रिया से जोड़कर देख रहा है।
करीब 70 साल पुरानी बताई जाती है मस्जिद
मीडिया रिपोर्टों में कलेक्ट्रेट परिसर की इस मस्जिद को करीब 70 साल पुराना बताया गया है। इसी वजह से जमीन और निर्माण को लेकर विवाद लंबे समय से संवेदनशील बना हुआ था।मस्जिद पक्ष ने भूमि और निर्माण को लेकर अपना दावा रखा था, लेकिन उपलब्ध न्यायिक प्रक्रिया में उसे फिलहाल राहत नहीं मिली। जिला अदालत द्वारा प्रशासन के पक्ष में फैसला दिए जाने के बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई।
अखिलेश ने भाजपा पर लगाए राजनीतिक आरोप
अखिलेश यादव ने इस मामले को केवल प्रशासनिक या भूमि विवाद तक सीमित नहीं माना। उन्होंने भाजपा सरकार पर धार्मिक मुद्दों के जरिए राजनीतिक माहौल प्रभावित करने का आरोप लगाया। उन्होंने अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का भी उल्लेख किया और दावा किया कि दूसरे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए धार्मिक विवादों को आगे किया जा रहा है।इन दावों को राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
प्रशासन का पक्ष: अदालत के आदेश पर हुई कार्रवाई
सहारनपुर प्रशासन का कहना है कि मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई किसी धार्मिक पहचान या आस्था को आधार बनाकर नहीं की गई। अधिकारियों के अनुसार संबंधित भूमि सरकारी है और वहां अनधिकृत कब्जे को हटाने के लिए पहले से बेदखली का आदेश मौजूद था।जिला अदालत द्वारा सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखने के बाद प्रशासन ने उसी आदेश के अनुपालन में कार्रवाई की। प्रशासन के इसी पक्ष और विपक्ष के कानूनी प्रक्रिया संबंधी सवालों के बीच विवाद का मुख्य केंद्र अब सामने आ गया है।
अब नजर आगे की कानूनी लड़ाई पर
ढांचा हटाए जाने के बाद मामले का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव उच्च न्यायालय में संभावित कानूनी चुनौती हो सकता है। मस्जिद पक्ष पहले ही उच्च अदालत जाने की तैयारी की बात कह चुका था। ऐसे में आगे की न्यायिक कार्रवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि विवादित भूमि और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर कानूनी स्थिति किस दिशा में जाती है।फिलहाल सहारनपुर में सुरक्षा व्यवस्था पर प्रशासन की नजर बनी हुई है। वहीं राजनीतिक दल इस कार्रवाई को लेकर सरकार पर लगातार हमला कर रहे हैं। इस विवाद में एक तरफ प्रशासन अदालत के आदेश का अनुपालन होने की बात कह रहा है, जबकि विपक्ष कार्रवाई के समय, तरीके और आगे न्यायिक राहत लेने के अवसर को लेकर सवाल उठा रहा है।

