सीतापुर: उत्तर प्रदेश के सीतापुर में ऐतिहासिक घंटाघर भवन में संचालित शहर कांग्रेस कमेटी का कार्यालय अब प्रशासनिक कार्रवाई के दायरे में आ गया है। नगर पालिका परिषद ने कार्यालय को खाली करने का आदेश जारी करते हुए संगठन को 15 दिनों के भीतर भवन का कब्जा सौंपने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि तय समय में आदेश का पालन नहीं होने पर वैधानिक प्रक्रिया के तहत परिसर खाली कराया जाएगा और कार्रवाई में होने वाला खर्च भी संबंधित पक्ष से वसूला जाएगा।
नजूल भूमि पर बने भवन को लेकर शुरू हुई कार्रवाई
नगर पालिका परिषद की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि तानसेनगंज स्थित ऐतिहासिक घंटाघर भवन नजूल भूमि पर निर्मित है। जांच के दौरान यह पाया गया कि भवन की पहली मंजिल पर लंबे समय से शहर कांग्रेस कमेटी का कार्यालय संचालित हो रहा है, लेकिन इसके समर्थन में कोई वैध आवंटन पत्र, पट्टा या अनुबंध उपलब्ध नहीं कराया गया। इसी आधार पर नजूल नियमों के तहत कब्जा हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
कांग्रेस ने जताया पुराना किरायेदारी का दावा
कांग्रेस संगठन ने अपने पक्ष में यह दलील दी कि वर्ष 1972 से वह इस भवन का किरायेदार है और तत्कालीन सरकार की ओर से उसे यह परिसर उपलब्ध कराया गया था। संगठन का कहना है कि कई दशकों से यहीं से पार्टी की गतिविधियां संचालित होती रही हैं, इसलिए उसे हटाना उचित नहीं होगा।
सरकारी रिकॉर्ड में नहीं मिले पर्याप्त दस्तावेज
प्रशासन के अनुसार उपलब्ध अभिलेखों की जांच के दौरान कांग्रेस के दावे की पुष्टि नहीं हो सकी। रिकॉर्ड में केवल 6 फरवरी 1971 को 320 रुपये किराया जमा होने का उल्लेख मिला। इसके बाद कई दशकों तक किराया जमा किए जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला। साथ ही संगठन की ओर से वैध आवंटन पत्र, पट्टा या अन्य कानूनी दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
प्रशासन ने नियमों का दिया हवाला
नगर पालिका का कहना है कि सरकारी नजूल संपत्ति पर किसी भी संस्था या व्यक्ति का कब्जा तभी वैध माना जाता है, जब उसके पास संबंधित दस्तावेज मौजूद हों और निर्धारित नियमों के अनुसार किराया या अन्य देय राशि का नियमित भुगतान किया गया हो। आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की स्थिति में कब्जे को वैध नहीं माना जा सकता।
आदेश का पालन नहीं हुआ तो होगा कब्जा
नगर पालिका परिषद ने कांग्रेस कमेटी को अंतिम रूप से 15 दिन का समय दिया है। यदि इस अवधि में परिसर खाली नहीं किया जाता है तो प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में भवन को खाली कराकर नगर पालिका अपने कब्जे में लेगी। इसके साथ ही पूरी कार्रवाई पर होने वाला खर्च भी नियमानुसार संबंधित पक्ष से वसूला जाएगा।
राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बढ़ सकती है हलचल
इस आदेश के बाद जिले में राजनीतिक चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। कांग्रेस समर्थक इस कार्रवाई को राजनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं, जबकि प्रशासन का कहना है कि पूरा निर्णय केवल उपलब्ध सरकारी अभिलेखों और नजूल नियमों के आधार पर लिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि सरकारी संपत्तियों का संरक्षण और उनका नियमानुसार उपयोग सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस कमेटी प्रशासन के आदेश के खिलाफ कानूनी राहत लेती है या निर्धारित समय सीमा के भीतर भवन खाली करती है। यदि अदालत से कोई राहत नहीं मिलती, तो आने वाले दिनों में घंटाघर भवन को खाली कराने की कार्रवाई शुरू हो सकती है।

