दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा है कि शादी की वैधता केवल सात फेरों से तय नहीं होती। अगर कोई जोड़ा समाज और परिवार के बीच एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार करता है, तो वह संबंध कानूनी रूप से मान्य माना जाएगा। ‘हम तेरे’ कहना भी बनाता है रिश्ता वैध अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह की भावना केवल रीतियों तक सीमित नहीं है। यदि दोनों व्यक्ति स्वेच्छा से साथ रहने और एक-दूसरे को जीवनसाथी मानने का निर्णय लेते हैं, तो सात फेरे न होने पर भी शादी को कानूनी मान्यता मिल सकती है। अदालत ने कहा कि भारतीय समाज में विवाह का मूल भाव आपसी स्वीकार्यता और निष्ठा में निहित है, न कि केवल धार्मिक रस्मों में।
मामला किससे जुड़ा था
यह फैसला उस याचिका पर आया जिसमें महिला ने दावा किया कि उसने पुरुष से बिना सप्तपदी लिए विवाह किया, लेकिन दोनों कई वर्षों तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अगर रिश्ते की मंशा स्पष्ट हो और दोनों ने सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार किया है, तो यह विवाह कानूनी रूप से वैध है।
समाज और कानून में नई दिशा
इस फैसले को विवाह कानून के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। अदालत ने कहा कि शादी केवल संस्कार नहीं बल्कि दो व्यक्तियों की सहमति और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इस निर्णय से उन जोड़ों को राहत मिलेगी जो पारंपरिक रस्मों के बिना भी साथ रहते हैं, लेकिन अपने रिश्ते को सामाजिक और कानूनी मान्यता देना चाहते हैं।