मध्य प्रदेश : सरकार ने कोनोकार्पस और सप्तपर्णी के पेड़ों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। राज्य में इन प्रजातियों के रोपण पर प्रतिबंध लगाया गया है। सरकार का कहना है कि आम लोगों के स्वास्थ्य और स्थानीय पारिस्थितिकी पर इनके संभावित प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।
इन पेड़ों की जगह अब स्थानीय, देशज और पर्यावरण के अनुकूल प्रजातियों को बढ़ावा देने की तैयारी है। इस फैसले के साथ मध्य प्रदेश ऐसा करने वाला देश का पांचवां राज्य बन गया है। इससे पहले कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और असम में भी इन प्रजातियों को लेकर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए जा चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट की समिति की रिपोर्ट के बाद बढ़ी चिंता
कोनोकार्पस और सप्तपर्णी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने अध्ययन किया था। समिति की रिपोर्ट में इन प्रजातियों से मानव स्वास्थ्य और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में इनके स्थान पर क्षेत्र के अनुकूल देशज प्रजातियों को लगाने की सिफारिश की गई।
परागकण से एलर्जी और सांस संबंधी परेशानी का खतरा
इन पेड़ों के परागकण संवेदनशील लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। इनके कारण एलर्जी और सांस से जुड़ी समस्याएं बढ़ने की आशंका जताई गई है। खासकर दमा या श्वसन संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोगों के लिए इनके परागकण अधिक परेशानी पैदा कर सकते हैं।
तेजी से फैलने वाली जड़ों से दूसरी वनस्पतियों पर असर
कोनोकार्पस और सप्तपर्णी तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों में शामिल हैं। इनकी जड़ें काफी गहराई तक फैल सकती हैं, जिससे स्थानीय वनस्पतियों के विकास पर असर पड़ने की आशंका रहती है। भूजल और आसपास मौजूद दूसरी वनस्पतियों पर भी इनके प्रभाव को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।
पक्षियों के लिए भी अनुकूल नहीं माना गया
इन प्रजातियों को स्थानीय जैव विविधता के लिहाज से भी उपयुक्त नहीं माना गया है। बताया गया है कि इन पेड़ों पर स्थानीय पक्षियों के घोंसले बनाने की संभावना कम रहती है। ऐसे में इनके बड़े पैमाने पर विस्तार से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।
राज्य सरकार अब इनकी जगह ऐसी देशज प्रजातियों को बढ़ावा देने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जो स्थानीय जलवायु, मिट्टी और जैव विविधता के लिए अधिक अनुकूल हों।

