दिल्ली। लखनऊ कोर्ट परिसर में सार्वजनिक रास्तों और अन्य उपयोग की जमीन पर बने कथित अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। साथ ही अनधिकृत निर्माणों पर कब्जा किए लोगों को उन्हें शांतिपूर्वक खाली करने का निर्देश दिया गया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि केवल किसी बार एसोसिएशन में पदाधिकारी होने के आधार पर कोई व्यक्ति सार्वजनिक या अनधिकृत जमीन पर बने ढांचे पर अपना अधिकार नहीं जता सकता।
वैकल्पिक जगह की मांग पर कोर्ट की दो टूक
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल ने वकीलों के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने की मांग रखी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनधिकृत निर्माण या कब्जे को केवल इस आधार पर जारी नहीं रखा जा सकता कि संबंधित व्यक्ति बार एसोसिएशन का अध्यक्ष या गवर्निंग बॉडी का सदस्य है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रास्तों और कोर्ट परिसर की खुली जगह पर कब्जा कर बनाए गए ढांचे स्वीकार्य नहीं हो सकते। अदालत के अनुसार, ऐसे निर्माणों की वजह से सड़कों और यातायात व्यवस्था पर भी असर पड़ा है।
कोर्ट ने कहा, हटाने होंगे सभी अवैध निर्माण
जस्टिस विक्रम नाथ ने सुनवाई के दौरान कहा कि लखनऊ कोर्ट परिसर की स्थिति से वह परिचित हैं और वहां हुए निर्माणों के कारण रास्तों व यातायात में बाधा उत्पन्न हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि अनधिकृत ढांचों को हटाया जाना होगा।
जब वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया तो अदालत ने कहा कि वकील अपने लिए जमीन की व्यवस्था कर सकते हैं और राज्य सरकार से किसी उपयुक्त व्यवस्था या सोसाइटी के लिए अनुरोध कर सकते हैं।
मध्यस्थता का सुझाव भी खारिज
वरिष्ठ अधिवक्ता की ओर से विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध भी किया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए अनधिकृत निर्माणों को शांतिपूर्वक खाली करने की सलाह दी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में पहले से चल रही थी कार्रवाई
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही उस कार्यवाही से जुड़ा है, जिसमें लखनऊ कोर्ट परिसर के आसपास वकीलों और अन्य लोगों द्वारा कथित तौर पर बनाए गए अनधिकृत चैंबरों और दुकानों का मुद्दा उठाया गया था।
हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, शुरुआत में 72 अतिक्रमणों की पहचान की गई थी। पहले चरण में इनमें से केवल 14 को हटाया जा सका था, क्योंकि कार्रवाई के दौरान विरोध और बाधा का सामना करना पड़ा।
बाद में अदालत के निर्देशों के बाद 100 से अधिक अवैध रूप से बनाए गए चैंबरों को हटाने की कार्रवाई की गई। हालांकि पहले से चिन्हित 72 अतिक्रमित चैंबरों और दुकानों में से कई के खिलाफ कार्रवाई विरोध के कारण पूरी नहीं हो सकी।
कब्जाधारियों को दिया गया था एक और मौका
हाई कोर्ट ने शेष अतिक्रमणकारियों को अपने चैंबर या दुकान खाली करने अथवा उस जमीन पर कब्जे का कोई वैध अधिकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करने का अवसर दिया था। वैध दावा पेश न करने की स्थिति में प्रशासन को अवैध ढांचे हटाने की कार्रवाई करने की अनुमति दी गई।
न्यायिक कामकाज प्रभावित न हो, इसके लिए कार्रवाई रविवार को करने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही पुलिस कमिश्नर, जिला मजिस्ट्रेट और नगर निगम प्रशासन को आपसी समन्वय के साथ पर्याप्त प्रशासनिक और पुलिस सहायता उपलब्ध कराने को कहा गया था, ताकि कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद लखनऊ कोर्ट परिसर में बचे हुए कथित अवैध निर्माणों और कब्जों पर कार्रवाई का रास्ता और साफ हो गया है।

