नई दिल्ली की आजादपुर मंडी और शहर के खुदरा बाजारों में सब्जियों की कीमतों का अंतर इस समय उपभोक्ताओं का ध्यान खींच रहा है। मंडी में कई सब्जियां कम भाव पर उपलब्ध बताई जा रही हैं, लेकिन स्थानीय दुकानों और मोहल्ले के बाजारों तक पहुंचते-पहुंचते इनके दाम कई गुना बढ़ जा रहे हैं।आजादपुर मंडी में आलू का भाव करीब 2 रुपये प्रति किलो बताया गया है, जबकि खुदरा बाजार में यही आलू करीब 20 रुपये किलो तक बिक रहा है। यानी दोनों स्तरों के बीच करीब दस गुना तक का अंतर दिखाई दे रहा है।
प्याज में भी भारी अंतर
प्याज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। मंडी में इसका भाव करीब 20 रुपये प्रति किलो बताया जा रहा है, जबकि कई खुदरा बाजारों में ग्राहक इसे 60 रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर खरीद रहे हैं।इसी तरह टमाटर, पालक और तुरई के मंडी भाव करीब 10 रुपये किलोबताए जा रहे हैं। बीन्स लगभग 30 रुपये और फूलगोभी करीब 15 रुपये प्रति किलो के स्तर पर बताई जा रही है। दूसरी ओर, स्थानीय बाजारों में कई सब्जियों के भाव 60 से 80 रुपये किलो तक पहुंचने की बात सामने आ रही है।
मंडी से दुकान तक जुड़ती हैं कई लागतें
थोक और खुदरा कीमतों में अंतर होना अपने आप में असामान्य नहीं है। किसान और मंडी से निकलने के बाद सब्जी को ग्राहक तक पहुंचाने में परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग, मजदूरी, छंटाई और भंडारण जैसी लागत जुड़ती है।इसके अलावा सब्जियों के खराब होने का जोखिम भी व्यापारियों को उठाना पड़ता है। खासकर पालक और अन्य हरी सब्जियां लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखी जा सकतीं। थोक कारोबारी, वितरक और खुदरा विक्रेता का मार्जिन भी अंतिम कीमत में शामिल होता है।हालांकि, जब मंडी और खुदरा बाजार के बीच अंतर कई गुना हो जाए तो यह सवाल जरूर उठता है कि कीमत में हुई बढ़ोतरी का कितना हिस्सा वास्तविक लागत है और कितना व्यापारिक मार्जिन।
मंडी का न्यूनतम भाव और दुकान का भाव एक जैसा नहीं
आजादपुर जैसी बड़ी मंडी में अलग-अलग राज्यों और उत्पादन क्षेत्रों से भारी मात्रा में सब्जियां आती हैं। आवक बढ़ने पर किसी सब्जी का थोक भाव काफी नीचे जा सकता है, जबकि कम आवक के दौरान यही कीमत तेजी से बढ़ सकती है।इसके अलावा मंडी में दर्ज न्यूनतम भाव हर किस्म और गुणवत्ता की सब्जी पर लागू नहीं होता। आकार, गुणवत्ता और ग्रेड के आधार पर एक ही सब्जी के अलग-अलग थोक भाव हो सकते हैं। इसलिए न्यूनतम मंडी भाव की तुलना सीधे खुदरा बाजार की औसत कीमत से करते समय इन पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
महंगाई का सीधा असर रसोई के बजट पर
आलू, प्याज और टमाटर जैसी सब्जियां लगभग हर परिवार की रोजाना की रसोई का हिस्सा हैं। इनके दाम बढ़ने पर मासिक घरेलू खर्च पर सीधा असर पड़ता है। खासकर प्याज का खुदरा भाव 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर जाना ग्राहकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।ग्राहकों का सवाल सीधा है कि अगर मंडी में प्याज करीब 20 रुपये किलो उपलब्ध है, तो वही उत्पाद खुदरा बाजार तक पहुंचने के बाद 60 रुपये से ज्यादा का कैसे हो जाता है।
किसानों के लिए भी कम मंडी भाव चिंता का विषय
थोक कीमतों में भारी गिरावट का असर सिर्फ ग्राहक पर नहीं पड़ता। यदि मंडी में किसी सब्जी का भाव उत्पादन लागत से काफी नीचे चला जाए तो किसानों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।ऐसी स्थिति में एक तरफ उपभोक्ता महंगी सब्जी खरीदता है और दूसरी तरफ उत्पादक को कम कीमत मिलती है। इससे पूरी सप्लाई चेन में मौजूद मूल्य अंतर पर सवाल खड़ा होता है।
आने वाले दिनों में राहत की उम्मीद कितनी?
यदि आजादपुर मंडी में सब्जियों की आवक मजबूत बनी रहती है और थोक भाव निचले स्तर पर बने रहते हैं तो प्रतिस्पर्धा के चलते खुदरा कीमतों पर भी दबाव आ सकता है। हालांकि वास्तविक राहत तभी मानी जाएगी जब मंडी की कीमतों में आई नरमी का फायदा अंतिम ग्राहक तक पहुंचे।मंडी और खुदरा बाजार के भाव में अधिक पारदर्शिता से उपभोक्ताओं को भी सही कीमत समझने में मदद मिल सकती है। फिलहाल करीब 2 रुपये का आलू 20 रुपये तक और करीब 20 रुपये का प्याज 60 रुपये से ज्यादा में बिकने की स्थिति यह सवाल जरूर खड़ा कर रही है कि सस्ती मंडी कीमत का फायदा आम ग्राहक तक आखिर कब पहुंचेगा।

