दिल्ली। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की नेशनल प्रेसिडेंट नेहा बोरा के संचालन में आयोजित GenZ On the Rise: Uniting Student Movements Across India सम्मेलन में देशभर के छात्र आंदोलनों और उनसे जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि परीक्षा में गड़बड़ी, शिक्षा के समान अवसरों की कमी, संस्थागत भेदभाव और असहमति की आवाज पर रोक को केवल कैंपस की समस्याओं के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इनके पीछे युवाओं के भविष्य और व्यवस्था में भरोसे से जुड़े बड़े सवाल हैं।
JPSC-JSSC आंदोलन से परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
झारखंड में JPSC-JSSC आंदोलन से जुड़ी हबीबा ने भर्ती परीक्षाओं को लेकर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि 4 जुलाई से शुरू हुआ 26 दिन का आंदोलन केवल पेपर लीक के विरोध तक सीमित नहीं था। प्रदर्शनकारियों ने भर्ती परीक्षाओं में कथित भ्रष्टाचार और परीक्षा संचालन की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।
हबीबा के मुताबिक उन्होंने आंदोलन के दौरान 14 दिन तक भूख हड़ताल की और बाद में तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि सरकार की कार्रवाई के बाद 45 परीक्षाएं जांच या कार्रवाई के दायरे में आईं, जिनमें 22 परीक्षाएं रद्द की गईं, जबकि अन्य मामलों में जांच जारी है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कुछ परीक्षाओं की जिम्मेदारी ऐसी एजेंसियों को दी गई थी जिन्हें पहले ब्लैकलिस्ट किया जा चुका था।
उन्होंने कहा कि युवाओं का समय आंदोलन में नहीं, पढ़ाई और अपने भविष्य को बनाने में लगना चाहिए। साथ ही उन्होंने चेताया कि यदि सरकार किए गए वादों को पूरा नहीं करती है तो झारखंड में आंदोलन दोबारा शुरू हो सकता है।
NEET के विरोध से जुड़े संघर्ष पर भी चर्चा
सम्मेलन में तमिलनाडु के NEET विरोधी आंदोलन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। मणि रत्नम ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा के केंद्रीकरण के खिलाफ चलाए गए संघर्ष और अपनी 18 दिन की भूख हड़ताल का अनुभव साझा किया।
इस दौरान अनीता के संघर्ष को भी याद किया गया। NEET के खिलाफ उनका आंदोलन तमिलनाडु में छात्र और सामाजिक आंदोलनों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है। वक्ताओं ने मेडिकल प्रवेश व्यवस्था में समान अवसर और छात्रों की चिंताओं को लेकर व्यापक बहस की जरूरत बताई।
अभिव्यक्ति की आजादी और कैंपस में असहमति का सवाल
वकील और NALSAR की पूर्व छात्रा मिहिरा सूद ने छात्र आंदोलनों को अभिव्यक्ति की आजादी और असहमति के अधिकार से जोड़ा। उन्होंने NALSAR छात्रों से संबंधित हालिया विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि पूर्व छात्रों की कानूनी चुनौती का परिणाम अदालत में उनके पक्ष में रहा, लेकिन संस्थागत प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं।
उनका तर्क था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति की जगह जरूरी है और विश्वविद्यालयों में इसका महत्व और बढ़ जाता है। कार्यक्रम में IIT दिल्ली और मलयालम यूनिवर्सिटी से जुड़ी आवाजें भी सामने आईं। इसी क्रम में PhD छात्रा अनीता शशि से जुड़े जाति आधारित भेदभाव के आरोपों का मुद्दा भी चर्चा में रहा।
युवा राजनीति में सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका
कार्यक्रम से बाहर मौजूद Gen Z छात्रों ने भी बदलते राजनीतिक माहौल पर अपनी राय रखी। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र सुशांत ने कहा कि अब युवाओं को लगता है कि सोशल मीडिया वीडियो के जरिए किसी मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाकर सरकार का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है।
हालांकि छात्रों ने सोशल मीडिया आधारित इस नए तरह के सोशल ऑडिट के खतरे भी गिनाए। उन्होंने स्कूल ठीक करो अभियान के दौरान सामने आई हिंसा का उदाहरण देते हुए माना कि डिजिटल माध्यम से मुद्दे तेजी से लोगों तक पहुंचते हैं, लेकिन इससे विवाद और तनाव बढ़ने का जोखिम भी रहता है।
छात्र मुद्दों को राष्ट्रीय बहस से जोड़ने की कोशिश
सम्मेलन का व्यापक उद्देश्य अलग-अलग राज्यों और संस्थानों में चल रहे छात्र संघर्षों को एक साझा मंच पर लाना रहा। परीक्षा की पारदर्शिता से लेकर शिक्षा में समान अवसर, संस्थागत जवाबदेही और असहमति के अधिकार तक कई मुद्दों को एक साथ रखा गया।
वक्ताओं की बातों से यह संदेश सामने आया कि युवाओं की शिकायतें अब केवल कैंपस तक सीमित नहीं हैं। परीक्षा और भर्ती व्यवस्था में भरोसा, शिक्षा तक पहुंच और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार ऐसे मुद्दे बन रहे हैं जिन पर आने वाले समय में छात्र संगठनों की सक्रियता और बढ़ सकती है।

