DUSU Election: दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव यानी DUSU में NSUI इस बार मजबूत अभियान के साथ मैदान में है, लेकिन संगठन के भीतर टिकट को लेकर असंतोष एक बार फिर चुनौती बन गया है। NSUI के कुछ ऐसे नेता चुनावी मुकाबले में उतर गए हैं, जिन्हें पार्टी के आधिकारिक पैनल में जगह नहीं मिली। इससे संगठन के घोषित उम्मीदवारों के सामने वोटों के बंटवारे का खतरा पैदा हो गया है।
चार प्रमुख पदों पर NSUI ने उतारे उम्मीदवार
NSUI ने DUSU चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए विजय शंकर मीणा, उपाध्यक्ष के लिए वीर छत्रथ, सचिव के लिए नम्रता चौधरी और संयुक्त सचिव पद के लिए गोपाल चौधरी को आधिकारिक उम्मीदवार बनाया है।
अंतिम मुकाबले में अध्यक्ष पद के लिए सात, उपाध्यक्ष के लिए पांच, सचिव के लिए चार और संयुक्त सचिव के लिए चार प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें उपाध्यक्ष पद पर दीपांशु शोकीन और संयुक्त सचिव पद पर विशेष यादव भी चुनाव लड़ रहे हैं। दोनों को NSUI के आधिकारिक पैनल में जगह नहीं मिली थी।
बागी उम्मीदवारों का इतिहास NSUI के लिए चिंता का कारण
यह पहली बार नहीं है जब टिकट से वंचित NSUI से जुड़े नेताओं ने संगठन के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ चुनावी मैदान संभाला हो। दिल्ली के अलावा पंजाब यूनिवर्सिटी के चुनावों में भी ऐसी स्थिति सामने आ चुकी है।
2025 के DUSU चुनाव में NSUI से जुड़ी उमांशी लांबा को पार्टी का टिकट नहीं मिला था। इसके बाद उन्होंने अध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा और 5,522 वोट हासिल किए। वहीं NSUI की आधिकारिक उम्मीदवार जॉसलिन चौधरी को 12,645 वोट मिले। इस चुनाव में ABVP के आर्यन मान ने 28,841 वोट के साथ जीत दर्ज की।
हालांकि निर्दलीय प्रत्याशी को मिले हर वोट को सीधे तौर पर NSUI का वोट मानना सही नहीं होगा। फिर भी यह चुनाव दिखाता है कि संगठन से जुड़ा कोई असंतुष्ट दावेदार बड़े मुकाबले में नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
2025 में NSUI सिर्फ एक प्रमुख पद जीत सकी थी
पिछले DUSU चुनाव में वोटों के संभावित विभाजन का असर NSUI के प्रदर्शन पर भी दिखाई दिया। संगठन को सिर्फ उपाध्यक्ष पद पर जीत मिली, जबकि अध्यक्ष समेत तीन प्रमुख पद ABVP के खाते में गए।
इसी तरह पंजाब यूनिवर्सिटी में 2024 के चुनाव के दौरान टिकट न मिलने के बाद अनुराग दलाल NSUI से अलग हो गए और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में PUCSC अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा। उन्होंने जीत हासिल कर संगठन को बड़ा झटका दिया। उस समय इसे निर्दलीय उम्मीदवार की ओर से अध्यक्ष पद जीतने की पहली घटना बताया गया था।
पंजाब यूनिवर्सिटी में भी सामने आई थी बगावत
2025 में पंजाब यूनिवर्सिटी के चुनाव में भी NSUI को टिकट वितरण के बाद असंतोष का सामना करना पड़ा। संगठन के सदस्य नवदीप सिंह मील और सागर खत्री को टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने विरोधी गुटों के साथ मिलकर चुनावी मुकाबला किया। इसके बाद NSUI ने कुछ बागी सदस्यों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की।
विरोधी संगठनों को मिल सकता है सीधा फायदा
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक छात्र राजनीति में टिकट न मिलने के बावजूद चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को नजरअंदाज करना किसी संगठन के लिए महंगा साबित हो सकता है। कई दावेदार चुनाव से पहले ही कैंपस में अपना अलग समर्थन आधार तैयार कर लेते हैं। ऐसे में टिकट की घोषणा के बाद असंतुष्ट नेताओं और उनके समर्थकों को संगठन के आधिकारिक अभियान से जोड़कर रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
DUSU चुनाव में यदि NSUI से जुड़े अलग-अलग उम्मीदवारों के बीच वोट बंटता है, तो इसका फायदा सीधे विरोधी संगठनों को मिल सकता है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र हर्षित के मुताबिक इस तरह का विभाजन NSUI के लिए ABVP विरोधी वोटों को एकजुट करना मुश्किल कर सकता है।

