लखनऊ से तंबाकू नियंत्रण को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्था के भीतर मौजूद एक अहम चुनौती की ओर ध्यान खींचा है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी यानी KGMU के कम्युनिटी डेंटिस्ट्री विभाग की ओर से किए गए सर्वे में शामिल 14.8 प्रतिशत दंत चिकित्सकों ने खुद तंबाकू सेवन करने की बात स्वीकार की। वहीं, मरीजों को तंबाकू छोड़ने के लिए काउंसिलिंग देने का विशेष प्रशिक्षण भी सीमित संख्या में चिकित्सकों के पास ही पाया गया।
सर्वे में उत्तर प्रदेश के कुल 264 डेंटिस्ट को शामिल किया गया था। विशेषज्ञों के मुताबिक ये आंकड़े बताते हैं कि तंबाकू नियंत्रण की रणनीति में आम लोगों के साथ स्वास्थ्य पेशेवरों को भी केंद्र में रखना जरूरी है।
264 डेंटिस्ट पर सर्वे, सामने आई चिंताजनक तस्वीर
KGMU के सर्वे में शामिल 264 दंत चिकित्सकों में से 14.8 प्रतिशत ने बताया कि वे खुद तंबाकू का सेवन करते हैं। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डेंटिस्ट मरीजों को तंबाकू से होने वाले नुकसान के बारे में समझाने और इसे छोड़ने के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
डॉक्टर की अपनी आदत और उसका व्यवहार मरीज पर भी असर डाल सकता है। ऐसे में स्वास्थ्यकर्मियों को तंबाकू मुक्त रखने की दिशा में काम करना भी तंबाकू नियंत्रण अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
काउंसिलिंग का प्रशिक्षण भी बेहद सीमित
सर्वे में केवल 37.1 प्रतिशत दंत चिकित्सकों के पास तंबाकू छोड़ने के इच्छुक मरीजों की काउंसिलिंग के लिए विशेष प्रशिक्षण पाया गया। यानी बड़ी संख्या में डेंटिस्ट मरीजों को तंबाकू छोड़ने की सामान्य सलाह तो दे सकते हैं, लेकिन निर्भरता कम करने और आदत छुड़ाने की व्यवस्थित प्रक्रिया के लिए उनके पास विशेष प्रशिक्षण नहीं था।
विशेषज्ञों के अनुसार तंबाकू मुक्ति काउंसिलिंग केवल नुकसान बताने तक सीमित नहीं होती। मरीज की आदत, सेवन की मात्रा, निर्भरता और छोड़ने की इच्छा का आकलन करने के बाद उसके लिए सही रणनीति तैयार करना भी इसका हिस्सा है।
मुंह की जांच के दौरान शुरुआती संकेत पकड़ सकते हैं डेंटिस्ट
तंबाकू सेवन का सीधा असर मुंह और दांतों पर पड़ता है। यही वजह है कि डेंटिस्ट तंबाकू से होने वाले शुरुआती बदलावों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
नियमित डेंटल जांच के दौरान मुंह में होने वाले असामान्य बदलावों को देखकर मरीज को समय रहते सावधान किया जा सकता है। इसके साथ ही डॉक्टर सीधे बातचीत के जरिए तंबाकू छोड़ने के लिए मरीज को प्रेरित कर सकते हैं।
सिर्फ नुकसान बताना नहीं, सही काउंसिलिंग भी जरूरी
सर्वे के आंकड़े स्वास्थ्य संस्थानों में तंबाकू मुक्ति से जुड़े प्रशिक्षण को मजबूत करने की जरूरत दिखाते हैं। चिकित्सकों को तंबाकू के नुकसान की जानकारी देने के साथ यह भी सिखाया जाना जरूरी है कि मरीज की निर्भरता को कैसे समझें और उसे धीरे-धीरे इस आदत से बाहर निकलने में किस तरह मदद करें।
इसके लिए मेडिकल संस्थानों में नियमित ट्रेनिंग, काउंसिलिंग मॉड्यूल और तंबाकू मुक्ति कार्यक्रमों को और प्रभावी बनाया जा सकता है।
स्वास्थ्यकर्मियों का अपना व्यवहार भी बनता है संदेश
तंबाकू नियंत्रण अभियान में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की व्यक्तिगत आदत भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। मरीज के सामने तंबाकू सेवन के नुकसान बताने वाले चिकित्सक का खुद इसका सेवन करना स्वास्थ्य संदेश की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए तंबाकू नियंत्रण की रणनीति केवल आम लोगों को जागरूक करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्वास्थ्य पेशेवरों को भी तंबाकू से दूर रखने, उनकी काउंसिलिंग क्षमता बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें तंबाकू मुक्ति सहायता उपलब्ध कराने पर समान रूप से ध्यान देना होगा।
KGMU सर्वे ने दिखाया, स्वास्थ्य तंत्र के भीतर भी जरूरी है बदलाव
सर्वे से यह संकेत मिलता है कि तंबाकू के खिलाफ लड़ाई को प्रभावी बनाने के लिए दो स्तरों पर काम करना होगा। एक ओर आम लोगों में जागरूकता बढ़ानी होगी, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्यकर्मियों को बेहतर प्रशिक्षण और तंबाकू मुक्ति सेवाओं से जोड़ना होगा।
यदि डेंटिस्ट और अन्य स्वास्थ्य पेशेवर मरीजों को वैज्ञानिक तरीके से काउंसिलिंग देने में सक्षम हों और खुद भी तंबाकू मुक्त जीवनशैली अपनाएं, तो तंबाकू नियंत्रण अभियान का असर और व्यापक हो सकता है।

