बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग केवल सलाह और सिफारिश देने वाली संस्था है। आयोग को किसी व्यावसायिक विवाद में धन की वसूली का आदेश जारी करने का कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किसी सक्षम प्राधिकारी की तरह रिकवरी का निर्देश नहीं दे सकता।
हार्वेस्टर सौदे से जुड़े विवाद में आया फैसला
यह मामला हार्वेस्टर मशीन की खरीद बिक्री से जुड़े विवाद का है। कमला मोटर्स ने लगभग 21 लाख रुपये में एक हार्वेस्टर बेचने का सौदा किया था, जिसके लिए खरीदार ने 30 हजार रुपये अग्रिम राशि के रूप में जमा की थी।
बाद में तय समय के भीतर बैंक से वित्तीय स्वीकृति नहीं मिल सकी और कोविड काल के कारण मशीन की डिलीवरी में भी देरी हुई। इसके चलते सौदा पूरा नहीं हो पाया। बाद में फाइनेंस स्वीकृत होने के बाद कंपनी ने मशीन उपलब्ध कराने की बात कही, लेकिन खरीदार ने सौदा रद्द कर दिया और आयोग समेत विभिन्न अधिकारियों से शिकायत की।
आयोग ने वसूली का दिया था आदेश
मामले की सुनवाई के बाद छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने कलेक्टर को निर्देश दिया था कि कमला मोटर्स से 1 लाख 26 हजार 500 रुपये वसूलकर संबंधित खरीदार को भुगतान कराया जाए।
इस आदेश को कमला मोटर्स ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि आयोग के पास इस प्रकार की धन वसूली का आदेश देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने आयोग की सीमित शक्तियां की स्पष्ट व्याख्या
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1995 की धारा 9 का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि आयोग का दायित्व केवल सुझाव देना और सिफारिश करना है। कानून ने उसे न्यायिक अधिकार या धन वसूली का आदेश देने की शक्ति नहीं दी है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी जांच या पूछताछ के लिए आयोग को सिविल कोर्ट जैसी कुछ सीमित शक्तियां मिल जाने से वह सिविल कोर्ट नहीं बन जाता।
व्यावसायिक विवाद में नहीं दे सकता रिकवरी का आदेश
हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला पूरी तरह एक व्यावसायिक लेनदेन से जुड़ा था। ऐसे विवाद में किसी पक्ष से रकम वसूलने और दूसरे पक्ष को भुगतान कराने का आदेश देना आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इस तरह का निर्देश केवल सिफारिश नहीं माना जा सकता, बल्कि यह ऐसा आदेश है जिसे जारी करने का अधिकार आयोग को कानून ने नहीं दिया है।
हाईकोर्ट ने आयोग का आदेश किया निरस्त
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आयोग ने अपनी वैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया है। इसी आधार पर आयोग द्वारा 23 सितंबर 2022 को जारी वसूली संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी वैधानिक संस्था को केवल उन्हीं अधिकारों का प्रयोग करना चाहिए, जो उसे संबंधित कानून के तहत प्रदान किए गए हैं।

