एशियन गेम्स 2026 में भारतीय मैराथन धावक सावन बरवाल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए इतिहास रच दिया है। जापान में आयोजित प्रतियोगिता की मैराथन स्पर्धा में उन्होंने 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड का समय निकालकर सिल्वर मेडल अपने नाम किया। उनके इस प्रदर्शन के साथ एशियन गेम्स की मैराथन में भारत का 44 साल से चला आ रहा पदक का इंतजार खत्म हो गया।इससे पहले भारत के लिए मैराथन में आखिरी पदक 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों में एच. के. सीताराम ने जीता था। उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया था।
35 किलोमीटर के बाद फिर बनाई बढ़त
सावन बरवाल ने रेस की शुरुआत से ही मजबूत प्रदर्शन किया। करीब 10 किलोमीटर तक उन्होंने बढ़त बनाए रखी और रेस के बड़े हिस्से में सबसे आगे रहे।करीब 30 किलोमीटर के आसपास कुछ समय के लिए वह दूसरे धावकों से पीछे हुए, लेकिन उन्होंने शानदार वापसी करते हुए 35 किलोमीटर के बाद फिर बढ़त हासिल कर ली। अंतिम चरण में जापान के यामाशिता ने रफ्तार बढ़ाई और सावन को पीछे छोड़ते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।सावन बरवाल को सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा, लेकिन उनका प्रदर्शन भारतीय मैराथन के लिए ऐतिहासिक रहा।
विदेशी धरती पर एशियन गेम्स पदक जीतने वाले पहले भारतीय मैराथन धावक
सावन बरवाल ने एक और खास उपलब्धि अपने नाम की है। वह विदेशी धरती पर आयोजित एशियन गेम्स में मैराथन पदक जीतने वाले पहले भारतीय धावक बन गए हैं।भारत ने इससे पहले एशियन गेम्स की मैराथन में जो पदक जीते थे, वे सभी घरेलू मैदान पर आए थे। 1951 में छोटा सिंह ने गोल्ड मेडल और सूरत सिंह माथुर ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था। इसके बाद 1982 में एच. के. सीताराम ने ब्रॉन्ज पदक हासिल किया था।
हिमाचल के साधारण परिवार से निकले सावन
सावन बरवाल हिमाचल प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं और देश के प्रमुख लंबी दूरी के धावकों में शामिल हैं। उनका परिवार आर्थिक रूप से सामान्य स्थिति में रहा है। उनके पिता ड्राइवर हैं।सीमित संसाधनों के बावजूद सावन ने दौड़ना जारी रखा। बाद में वह भारतीय सेना में शामिल हुए और सेना में रहते हुए भी एथलेटिक्स की ट्रेनिंग जारी रखी। उनके संघर्ष का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक समय उनके पास रनिंग शूज खरीदने तक के पैसे नहीं थे। तब उनके बड़े भाई ने उनकी मदद की थी।
चोट के बाद वापसी कर तोड़ा था 48 साल पुराना रिकॉर्ड
साल 2023 में सावन बरवाल को गंभीर चोट का सामना करना पड़ा था। इसके कारण उन्हें लंबे समय तक प्रतियोगिताओं से दूर रहना पड़ा। चोट से वापसी के बाद उन्होंने एक बार फिर अपनी क्षमता का परिचय दिया।इसी साल अप्रैल में रॉटरडैम में उन्होंने भारतीय मैराथन के दिग्गज धावक शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर सुर्खियां बटोरी थीं। उस रेस के अंतिम हिस्से में वह फिनिश लाइन के पास लड़खड़ाकर गिर भी गए थे, लेकिन उन्होंने तुरंत खुद को संभाला और दौड़ पूरी की।अब एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीतकर सावन बरवाल ने भारतीय मैराथन के इतिहास में अपना नाम एक खास उपलब्धि के साथ दर्ज करा दिया है।

