दिल्ली : आपातकालीन और नागरिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लोकसभा में सामने आए आंकड़ों ने एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश की है। राष्ट्रीय राजधानी में फिलहाल 1,34,526 सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स मौजूद हैं, जबकि दिल्ली सरकार ने इसके लिए 1,90,350 का लक्ष्य तय किया है। इस हिसाब से राजधानी में निर्धारित संख्या की तुलना में करीब 55 हजार वॉलंटियर्स की कमी है।
दिल्ली सरकार के सिविल डिफेंस निदेशालय के मुताबिक, सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स की कुल स्वीकृत संख्या 2,37,938 है। हालांकि मौजूदा तैनाती अभी तय लक्ष्य से भी काफी कम है।
कमी का आंकड़ा सामने आने के बाद क्यों बढ़ी चर्चा
सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स का इस्तेमाल सामान्य परिस्थितियों के साथ-साथ बड़े संकट और आपात स्थिति में भी किया जाता है। ऐसे में राजधानी जैसे संवेदनशील और घनी आबादी वाले क्षेत्र में इनकी पर्याप्त संख्या को नागरिक सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है।
इस कमी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हाल के वर्षों में देश में नागरिक सुरक्षा को लेकर तैयारियों पर विशेष जोर दिया गया है।
लाल किले से पीएम मोदी ने भी दिया था नेटवर्क मजबूत करने का संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश में मजबूत सिविल डिफेंस नेटवर्क तैयार करने की जरूरत पर जोर दिया था। उन्होंने आधुनिक तकनीक और प्रणालियों से वॉलंटियर्स को जोड़ने तथा मौजूदा दौर की चुनौतियों से निपटने के लिए एक मजबूत सिविल डिफेंस फोर्स तैयार करने की बात कही थी।
इस दृष्टि से दिल्ली में लक्ष्य और वास्तविक संख्या के बीच इतना बड़ा अंतर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर तब, जब किसी बड़े संकट के दौरान प्रशिक्षित नागरिक स्वयंसेवकों की भूमिका तेजी से बढ़ सकती है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी सामने आई थी इनकी अहम भूमिका
मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बीच देशभर में मॉक ड्रिल और सार्वजनिक सुरक्षा अभ्यास आयोजित किए गए थे। इन गतिविधियों में पुलिस और होम गार्ड के साथ सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स की भी बड़ी संख्या में तैनाती की गई थी।
एनसीसी कैडेटों समेत विभिन्न सुरक्षा और स्वयंसेवी समूहों को भी इन अभ्यासों में शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य आपात स्थिति में नागरिकों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय तथा तैयारियों को परखना था।
सिविल डिफेंस का काम आखिर क्या होता है
सिविल डिफेंस का मूल उद्देश्य किसी बड़े हमले, आपदा या आपात स्थिति के दौरान आम नागरिकों, संपत्ति और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में प्रशासन की मदद करना है। इसके अलावा प्रभावित क्षेत्रों में जरूरी सेवाओं को बहाल करने में भी इनकी भूमिका हो सकती है।
पहले सिविल डिफेंस की अवधारणा मुख्य रूप से युद्ध के दौरान नागरिकों को होने वाले नुकसान को कम करने तक सीमित थी। लेकिन समय के साथ इसके दायरे में काफी विस्तार हुआ है।
अब परमाणु, जैविक और रासायनिक खतरों के साथ प्राकृतिक आपदाओं तथा मानव निर्मित आपात स्थितियों से निपटने की तैयारी भी इसके व्यापक दायरे का हिस्सा है।
1962 के बाद बदली सुरक्षा रणनीति और फिर बना कानूनी ढांचा
भारत में मौजूदा सिविल डिफेंस व्यवस्था की नींव 1960 के दशक में सामने आई सुरक्षा चुनौतियों के बीच मजबूत हुई। 1962 के भारत-चीन युद्ध से पहले मुख्य रूप से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बड़े शहरों के लिए नागरिक सुरक्षा योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया जाता था।
लेकिन 1962 और 1965 के युद्धों के बाद देश की नागरिक सुरक्षा रणनीति पर व्यापक पुनर्विचार हुआ। इसके बाद संसद ने 1968 में सिविल डिफेंस एक्ट पारित किया, जिसने देशभर में सिविल डिफेंस के लिए औपचारिक कानूनी ढांचा तैयार किया।
अब दिल्ली में स्वीकृत संख्या, सरकारी लक्ष्य और वास्तविक उपलब्ध वॉलंटियर्स के बीच का अंतर यह सवाल खड़ा करता है कि राजधानी की नागरिक सुरक्षा व्यवस्था को भविष्य की चुनौतियों के लिए कितना मजबूत किया जा सकता है।

