अंबिकापुर के खरसिया रोड स्थित कुंडला वसुंधरा सिटी के 110 भवन मालिकों को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। वर्षों से चली आ रही भवन हटाने की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 20 अगस्त को दिए गए निर्णय में हाईकोर्ट ने राज्य शासन का 4 जुलाई 2012 का भवन हटाने संबंधी आदेश और नगर पालिका निगम अंबिकापुर के आयुक्त का 7 दिसंबर 2016 का आदेश निरस्त कर दिया।
इस फैसले से उन परिवारों को राहत मिली है, जिनके घरों पर लंबे समय से प्रशासनिक कार्रवाई की तलवार लटक रही थी।
निर्माण के लिए पहले मिल चुकी थी अनुमति
मामले के अनुसार, कुंडला वसुंधरा सिटी का विकास वसुंधरा बिल्डर्स और कालोनाइजर द्वारा संबंधित विभागों से आवश्यक स्वीकृतियां लेने के बाद किया गया था। रिकॉर्ड के मुताबिक नगर पालिका निगम अंबिकापुर ने 8 अगस्त 2007 को भवन निर्माण की अनुमति जारी की थी।
बाद में भवन निर्माण से जुड़ी नई अनुमति के लिए 1 फरवरी 2011 को आवेदन दिया गया। खास बात यह रही कि इस आवेदन को न तो औपचारिक रूप से खारिज किया गया और न ही उसका अंतिम निराकरण किया गया। इसके बावजूद भवनों को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई आगे बढ़ती रही।
140 भवनों के निर्माण से जुड़े दस्तावेज भी बने अहम आधार
मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि नगर निगम आयुक्त ने 3 अगस्त 2011 को निर्माणाधीन भवनों को पूरा करने की अनुमति दी थी। रिकॉर्ड के अनुसार 4 जनवरी 2012 तक 140 भवनों का निर्माण पूरा हो चुका था।
इसके अलावा छह अन्य भवनों के लिए 10 फरवरी 2012 को नई अनुमति भी जारी की गई। इसके बावजूद राज्य शासन ने 4 जुलाई 2012 को भवन हटाने का आदेश जारी कर दिया। बाद में इसी आधार पर नगर निगम आयुक्त ने 7 दिसंबर 2016 को 110 भवन मालिकों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।
परिवारों ने कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया
प्रशासनिक आदेशों के बाद कॉलोनी में रहने वाले परिवारों के बीच अपने मकानों को लेकर लंबे समय तक असमंजस और चिंता की स्थिति बनी रही। भवन मालिकों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर प्रशासनिक कार्रवाई को चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि विभाग के पास भवन निर्माण की अनुमति, लंबित आवेदन और बाद में जारी किए गए आदेशों से संबंधित महत्वपूर्ण रिकॉर्ड मौजूद थे। इसके बावजूद इन तथ्यों पर समुचित विचार किए बिना उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर जताई आपत्ति
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उपलब्ध दस्तावेजों और पूरी प्रक्रिया की जांच की। कोर्ट ने भवन निर्माण की लंबित अनुमति, 3 अगस्त 2011 के नगर निगम आयुक्त के आदेश, भवनों के पूर्ण होने की स्थिति और 140 भवनों से संबंधित Completion Certificate की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने पाया कि इन तथ्यों पर उचित विचार किए बिना भवन हटाने का आदेश पारित किया गया था। न्यायालय ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना।
2012 और 2016 के दोनों आदेश हुए निरस्त
हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य शासन द्वारा 4 जुलाई 2012 को जारी भवन हटाने का आदेश और नगर निगम आयुक्त का 7 दिसंबर 2016 का आदेश निरस्त हो गया है। इससे कुंडला वसुंधरा सिटी के 110 भवन मालिकों और वहां रहने वाले परिवारों को वर्षों पुरानी कार्रवाई से बड़ी राहत मिली है।

