बिलासपुर। हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही के शिकार हुए कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नो वर्क, नो पे का सिद्धांत हर मामले में यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। यदि कर्मचारी को विभागीय निष्क्रियता या प्रशासनिक गलती के कारण पदोन्नति से वंचित रखा गया है, तो उसे वेतन लाभ से पूरी तरह महरूम नहीं किया जा सकता। यह मामला सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त जीआर साहू से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि वर्ष 2011 में उनके कनिष्ठ अधिकारियों को डिप्टी कमिश्नर के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था, जबकि वे वरिष्ठ होने के बावजूद इस लाभ से वंचित रह गए। विभागीय समीक्षा पदोन्नति समिति (रिव्यू डीपीसी) ने भी याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए उपयुक्त माना था और उन्हें कनिष्ठों के ऊपर रखने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद विभाग ने लंबे समय तक फाइल दबाए रखी, जिससे याचिकाकर्ता अपनी सेवानिवृत्ति (31 दिसंबर 2016) तक उस पद पर कार्य नहीं कर सके।
हाईकोर्ट ने विभाग को ठहराया जिम्मेदार
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बचाव में नो वर्क, नो पे का सिद्धांत लागू करने का तर्क दिया। हालांकि, न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का पदोन्नत पद पर कार्य न कर पाना विभाग की सुस्ती और निष्क्रियता का परिणाम था, न कि कर्मचारी की विफलता। ऐसे में विभाग अपनी ही गलती का लाभ नो वर्क, नो पे का हवाला देकर नहीं उठा सकता।
50 प्रतिशत एरियर्स का आदेश
न्यायालय ने मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए माना कि चूंकि याचिकाकर्ता ने वास्तव में उस पद पर कार्य नहीं किया था, इसलिए उन्हें पूरा वेतन नहीं दिया जा सकता। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक की अवधि के लिए पदोन्नत पद और सहायक आयुक्त के वेतन के अंतर की 50 प्रतिशत राशि एरियर्स के रूप में चार माह के भीतर प्रदान करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समयसीमा में भुगतान नहीं किया जाता है, तो सरकार को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

