छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर अपनी तेजी से बढ़ती पहचान और विकास के साथ प्राचीन धार्मिक स्थलों के लिए भी जानी जाती है। शहर का पुरानी बस्ती इलाका मंदिरों और ऐतिहासिक धरोहरों का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां करीब दो किलोमीटर के दायरे में कई प्राचीन देवी मंदिर स्थित हैं, जहां साल भर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इन मंदिरों से जुड़ी लोककथाएं, पूजा-पद्धतियां और ऐतिहासिक मान्यताएं इन्हें खास बनाती हैं। आइए जानते हैं रायपुर के प्रमुख देवी मंदिरों की विशेषताएं।
1. मां महामाया मंदिर: राजा मोरध्वज से जुड़ी है मान्यता
पुरानी बस्ती स्थित मां महामाया मंदिर रायपुर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसकी कहानी राजा मोरध्वज तथा उनकी रानी कुमुददेवी से जुड़ी है।
किवदंती के मुताबिक, राजा और रानी नदी के किनारे घूम रहे थे, तभी उन्हें पानी में एक काला पत्थर दिखाई दिया, जिसके ऊपर नाग फन फैलाए बैठा था। पत्थर को बाहर निकलवाने पर आकाशवाणी हुई कि उसे कंधे पर उठाकर ले जाया जाए। राजा प्रतिमा को लेकर आगे बढ़े, लेकिन एक स्थान पर थककर उसे नीचे रख दिया। इसके बाद तमाम प्रयासों के बावजूद प्रतिमा वहां से नहीं हिली। मान्यता है कि उसी स्थान पर देवी की स्थापना की गई और आगे चलकर यह स्थल मां महामाया मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
2. मां दंतेश्वरी मंदिर: यादव समाज निभाता है पूजा की परंपरा
रायपुर के कुशालपुर चौक पर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा-पद्धति के लिए जाना जाता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, यह मंदिर करीब 200 साल पुराना है। इसकी खास बात यह है कि यहां पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी लंबे समय से यादव समाज के परिवार निभाते आ रहे हैं।
मंदिर से जुड़ी लोककथा के अनुसार, पहले इस इलाके में घना जंगल हुआ करता था। यादव समाज के लोग यहां मवेशी चराने आते थे। इसी दौरान गणेशिया बाई नाम की एक ग्वालिन ने देखा कि एक गाय के थन से अपने आप दूध एक पत्थर पर गिर रहा है। गांव के लोगों को इसकी जानकारी दी गई। जांच करने पर उस पत्थर को देवी स्वरूप माना गया। इसके बाद वहां छोटा मंदिर बनाकर प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। मान्यता है कि तभी से यादव परिवार इस मंदिर की पूजा परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
3. कंकाली मठ: साल में केवल दशहरे पर खुलते हैं पट
ब्राह्मणपारा क्षेत्र में स्थित कंकाली मठ रायपुर के प्राचीन धार्मिक स्थलों में शामिल है। मान्यता है कि करीब 600 साल पहले नागा साधुओं ने इसकी स्थापना की थी। कहा जाता है कि पुराने समय में इस क्षेत्र का इस्तेमाल श्मशान के रूप में होता था। कंकालों से जुड़ी मान्यताओं के कारण इस स्थान का नाम कंकाली पड़ा।
बाद में देवी की प्रतिमा को पास में बने मंदिर में स्थापित किया गया। इस मठ की सबसे विशिष्ट परंपरा यह है कि इसके पट सामान्य दिनों में बंद रहते हैं और दशहरे के अवसर पर ही खोले जाते हैं। इस दौरान विशेष पूजा-अर्चना होती है। मठ के भीतर प्राचीन अस्त्र-शस्त्र भी रखे होने की बात कही जाती है, जिन्हें नागा साधुओं के समय से जुड़ा माना जाता है।
मठ के सामने स्थित तालाब भी दशहरे के अवसर पर विशेष महत्व रखता है। इस दिन घरों में बोए गए जंवारा और ज्योत का विसर्जन यहां किया जाता है। इस परंपरा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।
4. शीतला माता मंदिर: पिंड स्वरूप में होती है पूजा
पुरानी बस्ती के अमीनपारा थाना क्षेत्र के पास स्थित शीतला माता मंदिर भी प्राचीन आस्था का केंद्र है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह मंदिर करीब 250 साल पुराना है। यहां देवी की पारंपरिक प्रतिमा के बजाय पत्थर के पिंड की पूजा की जाती है।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह पिंड जमीन से स्वतः प्रकट हुआ था। तभी से इसी स्वरूप में माता की आराधना की जा रही है। मंदिर में देवी को ठंडे भोजन और मिठाई का भोग चढ़ाने की परंपरा है। एक ही परिवार द्वारा कई पीढ़ियों से पूजा की जिम्मेदारी निभाए जाने की बात भी इस मंदिर की खास पहचान मानी जाती है।
आस्था, इतिहास और परंपराओं का संगम है पुरानी बस्ती
रायपुर की पुरानी बस्ती के देवी मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं हैं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक विरासत और लोक आस्था से भी जुड़े हैं। महामाया मंदिर की प्रचलित कथा, दंतेश्वरी मंदिर में यादव समाज की पूजा परंपरा, कंकाली मठ के दशहरा अनुष्ठान और शीतला माता मंदिर में पिंड पूजा की मान्यता इन स्थलों को अलग पहचान देती है। नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। इन मंदिरों का इतिहास और उनसे जुड़ी परंपराएं रायपुर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

