नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने वैज्ञानिक खदान बंदी को देश की सर्कुलर इकोनॉमी और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि जिन खदानों से खनिज संसाधन समाप्त हो चुके हैं, उन्हें अब बेकार जमीन नहीं, बल्कि नई संभावनाओं के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।
‘आरोह’ रिपोर्ट जारी कर दिया नया संदेश
नई दिल्ली में कोयला मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में डॉ. जितेंद्र सिंह ने ‘आरोह-खदान बंदी पर वार्षिक रिपोर्ट’ जारी की। इस दौरान उन्होंने कहा कि बंद हो चुकी खदानों को केवल खनन गतिविधि के अंत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक विकास और स्थानीय समुदायों के लिए नए अवसरों की शुरुआत माना जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नवाचार आधारित विकास दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
कचरे से संपदा बनाने पर दिया जोर
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक खदान बंदी केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के बेहतर उपयोग, कचरे से संपदा निर्माण, भूमि के पुनर्विकास और स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा देती है।उन्होंने कहा कि एक कोयला खदान का संचालन भले समाप्त हो जाए, लेकिन उसी स्थान पर विकास और रोजगार के नए रास्ते खोले जा सकते हैं।
नेट जीरो लक्ष्य हासिल करने में मिलेगी मदद
उन्होंने कहा कि यह पहल भारत के वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी। उनके अनुसार, प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग और पर्यावरण की बहाली सतत विकास के लिए आवश्यक है।
42 बंद खदानें बनीं सफल मॉडल
मंत्री ने वैज्ञानिक तरीके से बंद की गई 42 खदानों की सराहना करते हुए कहा कि ये परियोजनाएं भविष्य के लिए प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरी हैं। उनका कहना है कि ऐसे क्षेत्रों का उपयोग कृषि, सौर और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, पर्यटन, कौशल विकास केंद्रों तथा सामुदायिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।उन्होंने महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर भी विशेष जोर दिया।
जर्मनी के साथ सहयोग को बताया अहम
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था जीआईजेड के बीच हुए कार्यान्वयन समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता और भारतीय नवाचार का यह मेल वैज्ञानिक खदान बंदी को नई गति देगा। उन्होंने सुझाव दिया कि इस तरह की साझेदारी अन्य क्षेत्रों में भी अपनाई जानी चाहिए।
डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंचेगी जानकारी
उन्होंने सुझाव दिया कि वैज्ञानिक तरीके से पुनर्विकसित प्रत्येक खदान पर छोटी डिजिटल फिल्में बनाई जाएं, ताकि आम नागरिक, नीति निर्माता और अन्य हितधारक इन सफल मॉडलों को बेहतर ढंग से समझ सकें। उनका मानना है कि इससे नवाचार और जनभागीदारी दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
अन्य क्षेत्रों की सफल पहल का भी किया उल्लेख
अपने संबोधन में डॉ. जितेंद्र सिंह ने सड़क निर्माण में स्टील स्लैग के उपयोग और इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल से जैव ईंधन बनाने जैसी पहलों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक की मदद से कचरे को मूल्यवान संसाधन में बदला जा सकता है और यही सोच वैज्ञानिक खदान बंदी की मूल अवधारणा है।
कोयला मंत्रालय तैयार कर रहा व्यापक मॉडल
कोयला मंत्रालय वैज्ञानिक खदान बंदी के लिए एक व्यापक ढांचा लागू कर रहा है। इसमें पर्यावरणीय बहाली, स्थानीय समुदायों का विकास और खनन के बाद भूमि के दीर्घकालिक उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ‘आरोह-खदान बंदी पर वार्षिक रिपोर्ट’ में 42 वैज्ञानिक रूप से बंद की गई खदानों के विस्तृत अध्ययन, पुनर्विकास की प्रक्रिया और भविष्य की परियोजनाओं के लिए उपयोगी कार्यप्रणालियां भी शामिल की गई हैं।

