राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री ने डूबते सूर्य को दिया अर्घ्य, जानिए लोक आस्था के इस महापर्व की परंपराएं और महत्व

भारत के लोक पर्वों में छठ पूजा एक ऐसा पर्व है जो सूर्य उपासना, पर्यावरण प्रेम और आत्मसंयम का प्रतीक है। पूरे देश में खासकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाकों में इस पर्व को असीम श्रद्धा और अनुशासन के साथ मनाया जाता है। इस साल भी छठ पूजा 2025 के मौके पर देशभर के घाटों पर लाखों श्रद्धालु एकत्र हुए।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी आज शाम डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देवता और छठ मैया से देश और राज्य की खुशहाली की कामना की।

डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की अद्भुत परंपरा

छठ पूजा का सबसे प्रमुख चरण होता है — “संध्या अर्घ्य”, यानी डूबते सूर्य को जल अर्पित करना। इस दिन व्रतधारी महिलाएं नदी, तालाब या घाटों पर जाकर सूर्य देव को दूध, जल और ठेकुआ जैसे प्रसाद अर्पित करती हैं। ऐसा माना जाता है कि सूर्य की अंतिम किरण में आरोग्य, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद छिपा होता है।

राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री के साथ ही लाखों श्रद्धालुओं ने पूरे आस्था भाव से सूर्य को नमन किया। पटना के गांधी घाट, कुर्जी घाट, और दीघा घाट पर भारी भीड़ देखने को मिली। प्रशासन ने सुरक्षा और सफाई के पुख्ता इंतजाम किए थे।

 राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री ने दी बधाई

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक्स (Twitter) पर पोस्ट करते हुए लिखा —

“छठ पर्व सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। यह हमें संयम, शुद्धता और सेवा का संदेश देता है। सभी देशवासियों को छठ की हार्दिक शुभकामनाएं।” वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी राज्य की जनता को शुभकामनाएं देते हुए कहा —

“छठ बिहार की पहचान और लोक आस्था का सबसे बड़ा पर्व है। हमारी सरकार ने सभी घाटों पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। सभी लोग शांति और सौहार्द के साथ पर्व मनाएं।

छठ पूजा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

छठ पूजा की परंपरा वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती है। इस दिन सूर्य की उपासना इसलिए की जाती है क्योंकि सूर्य ही ऊर्जा, स्वास्थ्य और जीवन का स्रोत है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो सुबह और शाम सूर्य की किरणों से शरीर को विटामिन D प्राप्त होता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

छठ व्रत की सबसे खास बात है — इसमें कोई मूर्ति पूजा नहीं होती, बल्कि प्रकृति के तत्वों (जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी) की उपासना की जाती है। यही कारण है कि छठ को “पर्यावरण का पर्व” भी कहा जाता है।

व्रतधारियों का कठिन तप

छठ व्रत को करने वाले श्रद्धालु, जिन्हें पार्वणिन या व्रती कहा जाता है, वे चार दिनों तक निर्जल उपवास रखते हैं। वे न केवल स्वयं को पवित्र रखते हैं, बल्कि पूरे वातावरण को भी स्वच्छ बनाते हैं।

पहला दिन “नहाय-खाय”, दूसरा “खरना”, तीसरा “संध्या अर्घ्य” और चौथा “उषा अर्घ्य” कहलाता है। अंतिम दिन सुबह-सुबह व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करते हैं।

 देशभर में छठ का उल्लास

पटना, वाराणसी, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई जैसे महानगरों में भी प्रवासी बिहारी समाज ने बड़े उत्साह से छठ पूजा मनाई। घाटों को फूलों, दीपों और सजावट से जगमगाया गया। हर जगह “छठ मैया के गीतों” की गूंज सुनाई दी

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