भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को एक और बड़ी सफलता मिली है। हैदराबाद स्थित स्पेस स्टार्टअप टेकमी2स्पेस द्वारा विकसित देश की पहली स्वदेशी सैटेलाइट बैटरी ने अंतरिक्ष में सफल प्रदर्शन के बाद प्रतिष्ठित ‘फ्लाइट हेरिटेज’ प्रमाणन हासिल कर लिया है। इस उपलब्धि को भारत के बढ़ते स्पेस इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस उपलब्धि की सराहना करते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ी सफलता बताया है।
विदेशी निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम
वित्त मंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अब तक भारतीय सैटेलाइट निर्माताओं को इस महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरण के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। आयातित बैटरियां न केवल महंगी थीं, बल्कि उनकी आपूर्ति में भी लंबा समय लगता था।
ऐसे में स्वदेशी तकनीक से तैयार इस बैटरी का सफल परीक्षण भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के लिए नई संभावनाएं लेकर आया है।
‘आगमन’ मिशन में साबित की अपनी क्षमता
इस बैटरी ने अपनी विश्वसनीयता स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट के पहले मिशन ‘आगमन’ के दौरान साबित की। 18 जुलाई को हुए इस मिशन में पावरबैंक-50 बैटरी को सफलतापूर्वक तैनात किया गया था।
मिशन के दौरान यह बैटरी 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल में लगाए गए प्रायोगिक पेलोड को लगातार ऊर्जा उपलब्ध कराती रही। पूरे मिशन में इसके प्रदर्शन को सफल माना गया, जिसके बाद इसे ‘फ्लाइट हेरिटेज’ का दर्जा प्रदान किया गया।
क्या होता है ‘फ्लाइट हेरिटेज’ और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
अंतरिक्ष उद्योग में ‘फ्लाइट हेरिटेज’ किसी भी तकनीकी उपकरण के लिए बेहद अहम उपलब्धि मानी जाती है। यह प्रमाणित करता है कि संबंधित हार्डवेयर ने वास्तविक अंतरिक्ष मिशन में सफलतापूर्वक काम किया है।
सैटेलाइट निर्माता, लॉन्च कंपनियां और बीमा एजेंसियां आमतौर पर ऐसे उपकरणों को प्राथमिकता देती हैं जिनका प्रदर्शन अंतरिक्ष में पहले से साबित हो चुका हो। यही कारण है कि यह प्रमाणन किसी भी स्पेस टेक्नोलॉजी उत्पाद की विश्वसनीयता को कई गुना बढ़ा देता है।
उन्नत तकनीक से लैस है पावरबैंक-50
टेकमी2स्पेस के अनुसार, इस बैटरी पैक को विशेष रूप से अंतरिक्ष की कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें उच्च ऊर्जा घनत्व वाली लिथियम-आयन सेल, स्मार्ट बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, इनबिल्ट हीटिंग तकनीक और हल्के एल्युमिनियम संरचना का उपयोग किया गया है।
बैटरी को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह लॉन्च के दौरान होने वाले तीव्र कंपन, विकिरण, निर्वात वातावरण और अत्यधिक तापमान जैसी चुनौतियों का सामना कर सके।
छोटे सैटेलाइट मिशनों को मिलेगा बड़ा लाभ
स्टार्टअप का दावा है कि यह बैटरी 50 वॉट-घंटे से अधिक ऊर्जा संग्रहित करने में सक्षम है, जबकि इसका वजन केवल लगभग 380 ग्राम है। इसे विशेष रूप से क्यूबसैट और माइक्रो सैटेलाइट मिशनों के लिए विकसित किया गया है।
लो-अर्थ ऑर्बिट में संचालित होने वाले छोटे उपग्रहों को यह पांच वर्ष तक ऊर्जा उपलब्ध कराने की क्षमता रखती है, जिससे लंबी अवधि के मिशनों में भी इसका उपयोग संभव होगा।
भारत के स्पेस स्टार्टअप्स के लिए खुले नए अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपलब्धि से देश में सैटेलाइट निर्माण की लागत कम होगी और आयातित तकनीक पर निर्भरता घटेगी। इससे स्टार्टअप्स, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और निजी अंतरिक्ष कंपनियों को अधिक किफायती और विश्वसनीय विकल्प मिलेगा।
भारत का तेजी से विकसित हो रहा स्पेस सेक्टर अब स्वदेशी तकनीकों के सहारे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में और मजबूत स्थिति हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। टेकमी2स्पेस की यह सफलता उसी परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण मिसाल बनकर उभरी है।

