दुर्ग। पंडवानी गायन को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित लोकगायिका तीजन बाई का निधन हो गया। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे छत्तीसगढ़ सहित देशभर के कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए दुर्ग स्थित आवास लाया गया, जहां बड़ी संख्या में कलाकार, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
‘उनके जैसे कलाकार सदियों में जन्म लेते हैं’
भिलाई-चरोदा के महापौर निर्मल कोसरे ने तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि उनका जाना छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित कर उनकी असाधारण प्रतिभा का सम्मान किया था।
महापौर ने कहा कि एक छोटे से गांव से निकलकर तीजन बाई ने अपनी अद्भुत कला के दम पर दुनिया के 26 देशों में पंडवानी की प्रस्तुति दी और भारतीय लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई।
आने वाली पीढ़ियों के लिए रहेंगी प्रेरणा
उन्होंने कहा कि तीजन बाई की बुलंद आवाज, जीवंत मंच प्रस्तुति और लोककला के प्रति उनका समर्पण हमेशा नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रेरित करता रहेगा। पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
नम आंखों से दी अंतिम विदाई
रायपुर एम्स में लंबे समय तक उपचार के बाद शनिवार देर रात उनके निधन की खबर सामने आई। जैसे ही उनका पार्थिव शरीर दुर्ग पहुंचा, अंतिम दर्शन के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर वर्ग के लोगों ने नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उनकी यादों को साझा किया।
लोककला को दिलाई वैश्विक पहचान
छत्तीसगढ़ के भिलाई क्षेत्र में जन्मीं तीजन बाई का बचपन से ही पंडवानी लोककला से गहरा जुड़ाव रहा। उन्होंने कम उम्र में मंच पर प्रस्तुति देना शुरू किया और अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय तथा महाभारत की कथाओं को अनोखे अंदाज में प्रस्तुत कर देश-दुनिया में अलग पहचान बनाई। उनकी कला ने न केवल पंडवानी को नई पहचान दिलाई, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

