देश : भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष योजना का असर विदेशी मुद्रा जमा पर साफ दिखाई देने लगा है। एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 तक भारत में एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट का आंकड़ा 65 से 70 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। वहीं, कुल विदेशी मुद्रा जमा 80 से 85 अरब डॉलर के स्तर तक जाने का अनुमान लगाया गया है।
45 दिनों में ही 17.4 अरब डॉलर का निवेश आया
रिपोर्ट के अनुसार, 17 जुलाई 2026 तक देश में करीब 20 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह दर्ज किया गया है। इसमें सबसे बड़ा योगदान एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट का रहा, जो 17.4 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।एसबीआई के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. सौम्य कांति घोष ने कहा कि केवल 45 दिनों के भीतर एफसीएनआर (बी) जमा ने 2013 में जुटाए गए 26 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर लिया है।
सरकारी बैंकों की भूमिका सबसे अहम
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सबसे आगे हैं। इन बैंकों ने विदेशों में मौजूद मजबूत ग्राहक नेटवर्क और भरोसेमंद संबंधों का इस्तेमाल करते हुए बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी आकर्षित की है।रिपोर्ट में बताया गया है कि बैंक ऑनशोर और ऑफशोर रणनीतियों के संतुलित इस्तेमाल से इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।
मैच्योर होने वाली जमा राशि से और बढ़ सकता है आंकड़ा
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगस्त और सितंबर 2026 में परिपक्व होने वाली मौजूदा एफसीएनआर जमाओं का बड़ा हिस्सा नई योजना के तहत दोबारा जमा किया जा सकता है। अधिक ब्याज दरों के कारण खाताधारकों के रिन्यू करने की संभावना बढ़ी है।एसबीआई रिसर्च के अनुसार, शुरुआती अनुमान से अलग करीब 10 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि भी जुटाई जा सकती है। यह पूंजी उन देशों से आने की उम्मीद है, जहां कर संबंधी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
बाजार में अब भी बने हुए हैं कई सवाल
हालांकि इतनी बड़ी विदेशी पूंजी आमद के बावजूद वित्तीय बाजारों में कुछ सवाल बने हुए हैं। विशेषज्ञ यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन पूंजी प्रवाहों का विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों पर कितना असर पड़ा है और मजबूत आमद के बावजूद रुपया दबाव में क्यों बना हुआ है।
रुपये की भूमिका को लेकर जताई गई चिंता
एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पहले रुपया बाहरी आर्थिक झटकों को सहने वाला शॉक एब्जॉर्बर की तरह काम करता था, लेकिन अब यह भूमिका कमजोर होती नजर आ रही है।रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक व्यापार में बढ़ता तनाव, आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियां, भू राजनीतिक जोखिम और असंतुलित पूंजी प्रवाह को देखते हुए रुपये की स्थिरता बनाए रखना जरूरी है।विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और संतुलित पूंजी प्रवाह के जरिए रुपये को प्रतिस्पर्धी बनाए रखते हुए बाहरी दबावों से निपटने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

