दिल्ली : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भर्ती प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच कुलपति शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित ने आरोपों को खारिज करते हुए अपने कार्यकाल का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में नियुक्तियों की प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी की गई है और खासतौर पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों की भर्ती में नियमों का पालन किया गया।
कुलपति ने भर्ती प्रक्रिया पर लगाए जा रहे आरोपों को आधारहीन बताते हुए कहा कि उनके करीब साढ़े चार साल के कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय में आरक्षित वर्गों से जुड़ी भर्तियों में पारदर्शिता पर विशेष ध्यान दिया गया।
आरोपों के पीछे अभियान का लगाया आरोप
कुलपति पंडित ने दावा किया कि मीडिया के कुछ हिस्सों में उनके खिलाफ ऐसी खबरें और दावे सामने आ रहे हैं, जिन्हें वह तथ्यहीन और भ्रामक मानती हैं। उनके मुताबिक कुछ चुनिंदा दावों के आधार पर उनके खिलाफ एक नकारात्मक माहौल तैयार किया जा रहा है।
उन्होंने इस पूरे विवाद को अपने खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से जोड़ते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में हुई भर्तियों का रिकॉर्ड ही प्रक्रिया की पारदर्शिता का आधार है।
JNUSU और JNUTA पर भी साधा निशाना
भर्ती विवाद को लेकर कुलपति ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।
उनका कहना है कि दोनों संगठनों की ओर से उन्हें निशाना बनाने का प्रयास किया जा रहा है। कुलपति ने यह भी दावा किया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए ठोस प्रमाण सामने नहीं रखे गए हैं।
SC, ST और OBC भर्ती को लेकर क्या कहा
पंडित ने अपने बचाव में विशेष रूप से आरक्षित वर्गों की नियुक्तियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान SC, ST और OBC श्रेणियों में भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ाया गया।
उनका तर्क है कि यदि नियुक्तियों में अनियमितता या पक्षपात के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो उनके समर्थन में ठोस दस्तावेज या प्रमाण भी सामने आने चाहिए। फिलहाल वह इन आरोपों को प्रचार और राजनीतिक या संगठनात्मक विरोध से जोड़कर देख रही हैं।
अब विवाद का अगला पड़ाव क्या होगा
JNU में भर्ती प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों ने विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र तथा शिक्षक संगठनों के बीच मतभेद को फिर चर्चा में ला दिया है। कुलपति ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपने कार्यकाल के रिकॉर्ड को अपनी सबसे बड़ी दलील बताया है।
अब इस विवाद में आगे क्या नए तथ्य सामने आते हैं और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े आरोपों के समर्थन या विरोध में कौन से दस्तावेज पेश किए जाते हैं, इस पर सबकी नजर रहेगी। फिलहाल कुलपति का स्पष्ट रुख है कि उनके कार्यकाल में नियुक्तियों में पारदर्शिता बरती गई और उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों का ठोस आधार नहीं है।

