छत्तीसगढ़ : हाईकोर्ट ने फर्जी मार्कशीट के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप में बर्खास्त किए गए कबीरधाम जिले के एक शिक्षा कर्मी को बड़ी राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999 के अंतर्गत कार्यरत किसी भी कर्मचारी को नियमित विभागीय जांच किए बिना सेवा से नहीं हटाया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि आरोप चाहे गंभीर हों, लेकिन कार्रवाई हमेशा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप ही होनी चाहिए।
बर्खास्तगी और अपील दोनों आदेश रद्द
न्यायमूर्ति एन.के. चंद्रवंशी की एकलपीठ ने शिक्षा कर्मी सुरेश कुमार पटेल की याचिका स्वीकार करते हुए 15 जनवरी 2016 के बर्खास्तगी आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही कलेक्टर कबीरधाम और दुर्ग संभाग के आयुक्त द्वारा पारित अपीलीय आदेश भी रद्द कर दिए गए। अदालत ने याचिकाकर्ता को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है।
क्या था पूरा मामला
सुरेश कुमार पटेल की नियुक्ति 29 जुलाई 2006 को जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा में शिक्षा कर्मी वर्ग-3 के पद पर हुई थी। वह प्राथमिक शाला बाजार चारभाटा में पदस्थ थे। वर्ष 2016 में विभाग ने आरोप लगाया कि नियुक्ति के समय प्रस्तुत उनकी 12वीं की अंकसूची फर्जी थी। दस्तावेज के सत्यापन के बाद कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और प्रारंभिक जांच के आधार पर उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। कलेक्टर और संभाग आयुक्त से राहत नहीं मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सिर्फ प्रारंभिक जांच के आधार पर कार्रवाई उचित नहीं
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि नियुक्ति कथित धोखाधड़ी के आधार पर हुई थी, इसलिए विस्तृत विभागीय जांच आवश्यक नहीं थी। हालांकि हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सेवा से बर्खास्त करना एक बड़ा दंड है और ऐसे मामलों में नियम-7 के तहत विधिवत विभागीय जांच करना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि केवल प्रारंभिक जांच के आधार पर कर्मचारी को सेवा से हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
सेवा निरंतर मानी जाएगी, लेकिन पिछला वेतन नहीं मिलेगा
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता की सेवा निरंतर मानी जाएगी, लेकिन जिस अवधि में उन्होंने कार्य नहीं किया, उस समय का वेतन उन्हें नहीं मिलेगा। अदालत ने ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू किया है।
सरकार को दोबारा कार्रवाई की छूट
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार उचित समझे तो नियम-7 के तहत विधिसम्मत विभागीय जांच पूरी कर कानून के अनुसार याचिकाकर्ता के खिलाफ नए सिरे से कार्रवाई कर सकती है। इससे स्पष्ट है कि अदालत ने केवल प्रक्रिया में हुई त्रुटि को आधार बनाया है, आरोपों के गुण-दोष पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।

