केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त करने में भारतीय भाषाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभाषा और देशज भाषाओं को अपनाए बिना हम शिक्षा, प्रशासन और ज्ञान पर वास्तविक स्वामित्व नहीं पा सकते।
प्रधान एक कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत भाषा-आधारित सुधारों का जिक्र किया और कहा कि नई पीढ़ी को भारतीय भाषाओं में शिक्षा देना समय की मांग है।
प्रधान ने कहा कि नई शिक्षा नीति ने भारतीय भाषाओं को शिक्षा के मुख्यधारा में लाया है।
उन्होंने कहा कि: प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा-आधारित शिक्षा छात्रों के लिए समझ और रचनात्मकता बढ़ाती है।भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं, ताकि ज्ञान सभी के लिए सुलभ हो सके।तकनीक, इंजीनियरिंग, मेडिकल और लॉ जैसे क्षेत्रों में भी भारतीय भाषा सामग्री तेजी से विकसित की जा रही है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि ज्ञान की भाषा वही होती है जिससे समाज जुड़ा हो, इसलिए भारत को अपनी भाषाओं को आगे बढ़ाना होगा।केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज भी कई क्षेत्रों में अंग्रेज़ी को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता कायम है, जो ब्रिटिश शासन की विरासत है।
उन्होंने कहा कि: औपनिवेशिक मानसिकता व्यक्ति और समाज दोनों की प्रगति में बाधा बनती है।अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करना ही आधुनिक भारत की असली पहचान है।भारत की युवा पीढ़ी को आत्मविश्वासी बनाने के लिए भारतीय भाषाओं को समान महत्व देना आवश्यक है।
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प्रधान ने यह भी बताया कि डिजिटल सेवाओं, सरकारी पोर्टलों और तकनीक में भारतीय भाषाओं का उपयोग बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दौर में भारतीय भाषाओं को वैश्विक पहचान दिलाने का अवसर है।अंत में मंत्री ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा स्तंभ है। भारत यदि अपनी भाषाओं को मजबूत करता है, तो वैश्विक मंच पर और अधिक सशक्त बनकर उभरेगा।