दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस नजदीक आते ही राजधानी दिल्ली का सदर बाजार तिरंगे के रंग में सराबोर हो जाता है। बाजार की गलियों में राष्ट्रीय ध्वज, तिरंगा बैज, कलाई पर बांधने वाले बैंड और वाहनों के लिए छोटे-छोटे झंडों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इसी बाजार में एक ऐसी दुकान भी है, जिसका इतिहास देश की आजादी से पहले का है और जो तीन पीढ़ियों से तिरंगा बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
आजादी से पहले रखी गई थी इस विरासत की नींव
इस कारोबार की शुरुआत अब्दुल रहमान ने की थी। बताया जाता है कि उन्होंने देश की आजादी से पहले ही तिरंगा तैयार करना शुरू कर दिया था। उस दौर में खादी के कपड़े की मांग अधिक थी, इसलिए झंडे बनाने के लिए विशेष रूप से बंगाल से कपड़ा मंगाया जाता था। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोग भी इसी दुकान से तिरंगा और खादी खरीदने आते थे।
दूसरी पीढ़ी ने बढ़ाया कारोबार, मिली ‘फ्लैग अंकल’ की पहचान
अब्दुल रहमान के बाद उनके बेटे अब्दुल गफ्फार ने इस जिम्मेदारी को संभाला और राष्ट्रीय ध्वज निर्माण के कार्य को नई पहचान दिलाई। वर्ष 2025 में उनके निधन तक उन्होंने इस परंपरा को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘फ्लैग अंकल’ कहकर संबोधित किया था, जिसके बाद उनकी पहचान पूरे देश में और मजबूत हुई।
अब तीसरी पीढ़ी संभाल रही जिम्मेदारी
वर्तमान में अब्दुल मलिक इस पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि यह कारोबार केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि देशभक्ति से जुड़ा एक दायित्व है। इस वर्ष आजादी के 80वें वर्ष के अवसर पर उनका परिवार अब तक करीब 25 से 30 लाख तिरंगे तैयार कर विभिन्न स्थानों पर भेज चुका है।
हर बड़े राष्ट्रीय अवसर का रहा है गवाह
अब्दुल मलिक बताते हैं कि उनकी दुकान ने देश के कई महत्वपूर्ण दौर देखे हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय देशभक्ति की भावना के बीच तिरंगे की मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। इसके अलावा आपातकाल, कारगिल युद्ध, अन्ना आंदोलन और ‘हर घर तिरंगा’ अभियान जैसे कई अहम अवसरों के दौरान भी उनकी दुकान देशभक्ति के उत्साह की साक्षी रही है।
स्वतंत्रता दिवस से पहले बढ़ जाती है तिरंगे की मांग
अगस्त का महीना शुरू होते ही सदर बाजार में राष्ट्रीय ध्वज और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री तेज हो जाती है। यहां के व्यापारी इसे केवल कारोबार नहीं, बल्कि देश के प्रति सम्मान और गर्व का अवसर मानते हैं। तिरंगे के साथ बैज, रिबन और अन्य देशभक्ति से जुड़े सामान भी बड़ी संख्या में खरीदे जाते हैं।
तीन पीढ़ियां बदलीं, लेकिन तिरंगे के प्रति समर्पण नहीं बदला
अब्दुल रहमान से शुरू हुई यह यात्रा अब अब्दुल मलिक तक पहुंच चुकी है। समय के साथ पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन परिवार का राष्ट्रध्वज के प्रति समर्पण और सम्मान आज भी वैसा ही बना हुआ है। यही वजह है कि सदर बाजार की यह दुकान केवल एक कारोबार नहीं, बल्कि देशभक्ति की एक जीवंत विरासत बन चुकी है।

