सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने हाल ही में भाषा और पहचान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा कि दक्षिण भारतीय हिंदी न जानने की वजह से अलग-थलग नहीं पड़ना चाहते, बल्कि वे अपनी मातृभाषा और संस्कृति को संरक्षित रखते हुए पूरे देश से जुड़ाव महसूस करना चाहते हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि भाषा किसी भी व्यक्ति की पहचान का अहम हिस्सा है और भारत जैसा विविधता भरा देश तभी मजबूत बनता है जब सभी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान किया जाए। उन्होंने जोर दिया कि देश में एकता बनाए रखने के लिए भाषाई विविधता का सम्मान किया जाना जरूरी है।
नागरत्ना ने कहा कि दक्षिण भारत के कई लोग हिंदी सीखना तो चाहते हैं, लेकिन केवल भाषा न जानने के कारण किसी को कमतर समझना या सामाजिक रूप से अलग महसूस कराना उचित नहीं है।उन्होंने कहा, “हमारी भाषाएं हमारी विरासत हैं। हिंदी न जानना किसी को राष्ट्र से कम जुड़ा हुआ नहीं बनाता। हम सभी एक परिवार हैं, बस हमारी बोलियां अलग हैं।”
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी बताया कि शिक्षा, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में स्थानीय भाषाओं को महत्व देना चाहिए, ताकि आम नागरिक अपने अधिकारों को अच्छी तरह समझ सकें।उन्होंने सुझाव दिया कि तकनीक और अनुवाद उपकरणों की मदद से भाषाई अंतर को कम किया जा सकता है।
भारत में 22 अनुसूचित भाषाएं और सैकड़ों बोलियां मौजूद हैं। ऐसे में, न्यायमूर्ति का यह बयान भाषाई सम्मान और राष्ट्रीय एकता पर एक सकारात्मक संदेश की तरह देखा जा रहा है।उन्होंने कहा कि विविधता ही भारत की ताकत है और भाषा को विभाजन का कारण नहीं बनने देना चाहिए।