भारत अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाने जा रहा है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोमवार को घोषणा की कि देश के स्पेस लॉन्च व्हीकल्स में जल्द ही भारत में विकसित सेमीकंडक्टर चिप्स का इस्तेमाल किया जाएगा।
स्काईरूट एयरोस्पेस के अधिकारियों के साथ बैठक के बाद अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा, “हमारे रॉकेट के लिए मेड इन भारत चिप्स… जल्द ही।”
स्काईरूट के विक्रम-1 मिशन की सफलता के बाद बढ़ा भरोसा
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब हाल ही में स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 टेस्ट फ्लाइट-1 मिशन ने सफल उड़ान पूरी की है। यह भारत के निजी क्षेत्र द्वारा विकसित पहला ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट मिशन था।
इस मिशन के दौरान रॉकेट ने करीब 450 किलोमीटर की कक्षा में पेलोड स्थापित किया। इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिनके पास निजी कंपनियों के जरिए ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता मौजूद है।
सरकार और स्काईरूट मिलकर बढ़ा रहे अंतरिक्ष तकनीक
अश्विनी वैष्णव के बयान के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। कंपनी ने कहा कि वह उस समय का इंतजार कर रही है, जब भारत में निर्मित सेमीकंडक्टर चिप्स उसके रॉकेट में इस्तेमाल होंगी।
कंपनी ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों और डीप टेक इकोसिस्टम के विकास की भी सराहना की। स्काईरूट का मानना है कि स्वदेशी तकनीक के इस्तेमाल से भारत की अंतरिक्ष क्षमताएं और मजबूत होंगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्काईरूट के संस्थापकों से की थी मुलाकात
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक पवन चंदाना और नागा भरत डाका से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने विक्रम-1 मिशन की सफलता के लिए पूरी टीम को बधाई दी।
प्रधानमंत्री ने स्काईरूट की अब तक की यात्रा, भविष्य की योजनाओं और अंतरिक्ष क्षेत्र में कंपनी के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत देश की तकनीकी क्षमता को नई ऊंचाई दे रही है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम कदम
स्काईरूट ने भी प्रधानमंत्री के साथ हुई मुलाकात को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इस दौरान कंपनी के सफर, विक्रम-1 मिशन और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हुई।
विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरिक्ष प्रक्षेपण यानों में स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप्स का उपयोग भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा। यह कदम मेक इन इंडिया अभियान और देश के निजी स्पेस सेक्टर को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

