कोटा। राजस्थान के कोटा में बच्चे के जन्म के बाद किडनी फेलियर की समस्या से जूझ रहीं पांच महिलाओं ने डायलिसिस कराने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि बार-बार डायलिसिस कराने के बावजूद स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो रहा, इसलिए अब उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट कराया जाए। परिवारों ने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर मांग की है कि यदि ट्रांसप्लांट संभव नहीं है तो इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।
70 दिन से अधिक समय से चल रहा इलाज
रिपोर्ट के अनुसार धन्नी सुमन, रागिनी मीणा, सुशीला महावर, पिंकी एयरवाल और आरती चौबदार की तबीयत मई की शुरुआत में प्रसव के बाद बिगड़ गई थी। तब से अब तक इन सभी का 32 बार डायलिसिस किया जा चुका है और वे 70 दिनों से अधिक समय से अस्पताल में उपचाररत हैं।
इसी मामले से जुड़े घटनाक्रम में कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद आई जटिलताओं के कारण पांच अन्य महिलाओं की मौत भी हो चुकी है।
डायलिसिस से डरने लगी हैं मरीज
मरीजों के परिजनों का कहना है कि लगातार डायलिसिस के कारण महिलाओं की शारीरिक और मानसिक स्थिति बेहद खराब हो गई है। सुमन के पति मोहन लाल ने बताया कि उनकी पत्नी अब डायलिसिस का नाम सुनते ही घबरा जाती हैं। प्रक्रिया शुरू होने के कुछ समय बाद ही उन्हें उल्टी, तेज बुखार और कंपकंपी की शिकायत होने लगती है।
रागिनी मीणा ने भी कहा कि डायलिसिस बेहद पीड़ादायक है और लंबे समय से इलाज के बावजूद कोई खास सुधार नजर नहीं आ रहा।
दो मरीज अस्पताल छोड़कर चली गईं
पिंकी एयरवाल और आरती चौबदार ने डायलिसिस कराने से इनकार करते हुए अस्पताल छोड़ दिया। उन्होंने अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही के आरोप लगाए। वहीं रागिनी के पति लोकेश मीणा का आरोप है कि अस्पताल का स्टाफ उन्हें लगातार डिस्चार्ज लेने के लिए कह रहा था।
राष्ट्रपति को भेजा पत्र
बुधवार को पांचों महिलाओं के परिवारों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र भेजकर किडनी ट्रांसप्लांट की मांग की। पत्र में कहा गया है कि यदि ट्रांसप्लांट संभव नहीं है तो उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए। यह कदम जिला प्रशासन को दिए गए 48 घंटे के अल्टीमेटम की अवधि समाप्त होने के बाद उठाया गया।
परिजनों का दर्द
मरीजों के परिवारों का कहना है कि वे अपनी बेटियों और बहुओं को रोज इस तरह तड़पते हुए नहीं देख सकते। उनका कहना है कि यदि सरकार स्थायी इलाज नहीं दे सकती तो इस पीड़ा से मुक्ति का रास्ता दिया जाए।
अस्पताल ने क्या कहा
न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्राचार्य डॉ. नीलेश जैन ने बताया कि सभी मरीजों का इलाज जारी है और उनकी स्थिति फिलहाल स्थिर है। उन्होंने कहा कि मरीजों को करीब 20 दिन पहले ही अस्पताल से छुट्टी देने की अनुमति मिल गई थी और वे निर्धारित समय पर डायलिसिस के लिए अस्पताल आ सकती हैं।
डॉ. जैन ने स्पष्ट किया कि डायलिसिस बंद करना मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में पहले करीब तीन महीने तक दवाओं और उपचार से किडनी की कार्यक्षमता सुधारने का प्रयास किया जाता है। इसके बाद विशेषज्ञ यह तय करते हैं कि मरीज को किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता है या नहीं।
आरोपों से अस्पताल का इनकार
अस्पताल प्रशासन ने लापरवाही के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यदि मरीजों या उनके परिजनों को किसी तरह की समस्या है तो उन्हें सीधे प्रशासन के सामने रखना चाहिए, ताकि उसका समाधान किया जा सके।

