भारत जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। नीति आयोग ने गुरुवार को भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण रोडमैप जारी किया है इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि साल 2035 तक भारत की बायोइकोनॉमी 691 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है।इस लक्ष्य के साथ भारत न सिर्फ दुनिया की शीर्ष तीन जैव-प्रौद्योगिकी शक्तियों में शामिल होने की तैयारी कर रहा है, बल्कि इससे 3 करोड़ से ज्यादा उच्च कौशल वाले रोजगार के अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है।
चौथी औद्योगिक क्रांति में बायोटेक्नोलॉजी निभाएगी बड़ी भूमिका
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस रूपरेखा को जारी करते हुए कहा कि चौथी औद्योगिक क्रांति में जैव-प्रौद्योगिकी की भूमिका सबसे अहम रहने वाली है।उन्होंने बताया कि इस समय पूरी दुनिया की जैव-अर्थव्यवस्था का आकार करीब 1.4 से 1.8 ट्रिलियन डॉलर के बीच है। वहीं भारत में 11 हजार से ज्यादा जैव-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप काम कर रहे हैं, जो इस क्षेत्र की तेजी से बढ़ती क्षमता को दिखाता है।डॉ. सिंह के अनुसार, भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिन्होंने बायोटेक्नोलॉजी के विकास के लिए विशेष नीतियां तैयार की हैं। अब देश केवल दूसरे देशों के मॉडल को अपनाने के बजाय खुद वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
2047 तक 2.6 ट्रिलियन डॉलर की बायोइकोनॉमी बनाने का विजन
नीति आयोग की रिपोर्ट में 2047 तक भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को 2.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। अनुमान है कि उस समय देश की GDP में जैव-अर्थव्यवस्था की हिस्सेदारी 8 से 10 प्रतिशत तक हो सकती है।इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जैव-विनिर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित बायोटेक्नोलॉजी, आसान नियामकीय प्रक्रियाएं और निजी उद्योग की भागीदारी को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
देश में शुरू होंगे छह बड़े राष्ट्रीय जैव मिशन
भारत की जैव-प्रौद्योगिकी क्षमता को मजबूत करने के लिए रिपोर्ट में छह राष्ट्रीय जैव मिशन शुरू करने का सुझाव दिया गया है।
इन मिशनों में शामिल हैं:
- जीन और कोशिका उपचार तकनीक
- जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि
- सिंथेटिक बायोलॉजी
- रोगों की निगरानी व्यवस्था
- समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी
- नई पीढ़ी की जैव-औषधियों का विकास
इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर भारत स्वास्थ्य, कृषि और उद्योग के क्षेत्र में नई तकनीकी क्षमता विकसित करना चाहता है।
50 हजार करोड़ रुपये के फंड से मिलेगी रिसर्च को रफ्तार
रिपोर्ट में साल 2026 से 2035 के बीच 50 हजार करोड़ रुपये के जैव-अर्थव्यवस्था विकास कोष की स्थापना का प्रस्ताव दिया गया है।इस फंड का उद्देश्य प्रयोगशालाओं में होने वाले शोध को बाजार तक पहुंचाना है, ताकि नई तकनीक केवल शोध तक सीमित न रहे बल्कि बड़े स्तर पर उत्पादन और व्यावसायिक उपयोग में लाई जा सके।इसके साथ ही उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना, तेज मंजूरी प्रक्रिया और बौद्धिक संपदा अधिकारों को मजबूत करने की भी सिफारिश की गई है।
इंजीनियरिंग बायोलॉजी से तैयार होंगे भविष्य के विशेषज्ञ
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मजबूत जैव-अर्थव्यवस्था के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करना जरूरी है। इसी दिशा में भारत में पहली बार इंजीनियरिंग बायोलॉजी का पाठ्यक्रम शुरू किया जा रहा है।यह नया क्षेत्र जीव विज्ञान और इंजीनियरिंग के मेल से भविष्य की तकनीकों को विकसित करने में मदद करेगा और देश को नई पीढ़ी के विशेषज्ञ उपलब्ध कराएगा।
2014 से अब तक 16 गुना बढ़ी भारत की जैव-अर्थव्यवस्था
रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जैव-अर्थव्यवस्था ने पिछले एक दशक में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की है। साल 2014 में इसका आकार करीब 10 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2025 में 195.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।वर्तमान में जैव-अर्थव्यवस्था का योगदान भारत की GDP में करीब 4.8 प्रतिशत है।
स्वास्थ्य से रोजगार तक, हर क्षेत्र में मिलेगा फायदा
सरकार का मानना है कि मजबूत जैव-अर्थव्यवस्था भारत को स्वास्थ्य सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में मजबूती देगी। इसके अलावा लाखों उच्च कौशल वाले रोजगार पैदा होंगे और वैश्विक स्तर पर भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी।भारत का लक्ष्य अब केवल जैव-प्रौद्योगिकी का उपभोक्ता बनने का नहीं, बल्कि इस क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने का है।

