नई दिल्ली। बढ़ते तापमान का असर अब सिर्फ दिन के समय महसूस नहीं किया जा रहा, बल्कि रात की गर्मी भी लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रही है। क्लाइमेट सेंट्रल की एक नई वैश्विक रिपोर्ट में सामने आया है कि गर्म और उमस भरी रातों के कारण भारत के कई हिस्सों में लोग हर साल कई घंटे की नींद खो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम में बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की नींद, सेहत और काम करने की क्षमता को भी प्रभावित कर रहा है।
दक्षिण भारत में गर्म रातों का सबसे ज्यादा असर
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण भारत के कई राज्यों में रात के बढ़ते तापमान के कारण नींद प्रभावित हो रही है। पुडुचेरी में लोग औसतन हर साल करीब 92 घंटे की नींद खो रहे हैं। वहीं आंध्र प्रदेश में यह आंकड़ा 88.6 घंटे और केरल में 88.3 घंटे दर्ज किया गया है।
तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना में भी गर्म रातों का असर लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु में लगभग 7.9 घंटे और कर्नाटक में 7.8 घंटे की अतिरिक्त नींद केवल बदलते जलवायु हालात के कारण कम हो रही है।
बड़े शहरों में भी बढ़ रही रात की गर्मी की समस्या
देश के महानगरों में भी गर्म रातों का प्रभाव तेजी से देखने को मिल रहा है। चेन्नई में एक व्यक्ति सालाना औसतन करीब 93 घंटे कम सो पा रहा है। इसके अलावा मुंबई में 84 घंटे, कोलकाता में 80 घंटे और दिल्ली में करीब 66 घंटे की नींद प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, कंक्रीट का विस्तार और हरित क्षेत्रों में कमी के कारण शहरों में रात के तापमान में गिरावट कम हो रही है। इसका सीधा असर लोगों के आराम और नींद की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
नींद की कमी से बढ़ सकता है बीमारियों का खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति के लिए रोजाना 7 से 9 घंटे की अच्छी नींद जरूरी होती है। लेकिन जब रात का तापमान अधिक बना रहता है तो शरीर को आराम मिलने में परेशानी होती है और गहरी नींद प्रभावित होती है।
लंबे समय तक नींद पूरी नहीं होने पर हाई ब्लड प्रेशर, हृदय संबंधी बीमारियां, स्ट्रोक, मधुमेह, मोटापा, मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
पांच दशकों में दोगुना हुआ गर्म रातों का खतरा
क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट में भारत समेत दुनिया के 1,338 शहरों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 1970 के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली नींद की कमी लगभग दोगुनी हो चुकी है।
वर्ष 2020 से 2025 के बीच दुनिया भर में लोगों ने गर्म रातों के कारण औसतन 56 घंटे की नींद गंवाई। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसमें 10 प्रतिशत से अधिक योगदान सीधे जलवायु परिवर्तन का है।
ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन बड़ी वजह
वैज्ञानिकों के अनुसार, जीवाश्म ईंधनों का अधिक इस्तेमाल और ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन वैश्विक तापमान में वृद्धि का प्रमुख कारण है। यदि उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में गर्म रातों की समस्या और गंभीर हो सकती है।
रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच चुका है और इससे निपटने के लिए पर्यावरण संरक्षण के साथ स्वास्थ्य संबंधी रणनीतियों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

