नई दिल्ली: इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड में नौकरी के लिए योग्य होने के बावजूद एक महिला को केवल महिला होने के आधार पर नियुक्ति नहीं मिली। कंपनी की ओर से काम की प्रकृति, LPG सिलेंडर उठाने और रात की शिफ्ट जैसी दलीलें दी गईं। मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने इस आधार पर नौकरी से वंचित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई और IOC को 12 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।
महिला होने को नियुक्ति से जोड़ना अदालत को नागवार गुजरा
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान IOC की दलीलों पर सवाल उठाए। कंपनी की ओर से कहा गया था कि संबंधित पद पर भारी गैस सिलेंडरों को उठाने का काम शामिल था और ड्यूटी के दौरान रात की शिफ्ट भी करनी पड़ सकती थी। अदालत ने इस तर्क के आधार पर महिला को अनुपयुक्त मानने पर आपत्ति जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि घरों में महिलाएं खुद LPG सिलेंडर उठाने और बदलने का काम करती हैं। पीठ ने केवल महिला होने के आधार पर नियुक्ति से इनकार किए जाने को उनके सम्मान और गरिमा से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना।
नौकरी की जगह क्यों मिला 12 लाख रुपये का मुआवजा?
मामला कई वर्षों तक अदालतों में चलता रहा। इस दौरान याचिकाकर्ता सुमित्रा अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुकी हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इस समय नियुक्ति देने के बजाय एकमुश्त 12 लाख रुपये का मुआवजा देना उचित माना।
1988 में शुरू हुआ था मामला
सुमित्रा हरियाणा के गुड़्हा गांव की रहने वाली हैं। वर्ष 1988 में उन्होंने IOC के LPG बॉटलिंग प्लांट में रिफिलिंग हेल्पर या कैजुअल खलासी के पद के लिए आवेदन किया था। वह उन 49 लोगों में शामिल थीं, जिनकी नियुक्ति के लिए डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली स्थानीय समिति ने सिफारिश की थी। इनमें से 43 उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र मिला, लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं दी गई।
पहले ट्रायल कोर्ट से मिली थी राहत
सुमित्रा ने नियुक्ति नहीं मिलने के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट ने माना था कि वह निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं और उन्हें कंपनी में किसी उपयुक्त पद पर समायोजित करने का निर्देश दिया था। बाद में अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी 14 अक्टूबर 2025 के आदेश में अपीलीय फैसले को बरकरार रखा था।
इसके बाद सुमित्रा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत ने मामले के लंबे कानूनी इतिहास और उनकी वर्तमान उम्र को देखते हुए नियुक्ति के बजाय मुआवजे का रास्ता चुना। केस का नाम सुमित्रा बनाम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेश

